ऐ मेरे दिल कहीं और चल,

फायरफॉक्स की सूरत से दिल भर गया,

ढ़ूंढ ले परसोना कोई नया।

चल जहां बोरियत न हो,

जहां गुस्से की आकांशा न हो,

बस शान्ति हो जहां।

मुझे यह बताने की जरूरत नहीं है कि फायरफॉक्स सबसे बेहतरीन वेब ब्रॉउसर है पर क्या इसकी एक ही सूरत देखते आपका मन नहीं भरता, क्या आप नहीं चाहते कि यह बदल जाय। यदि आपका जवाब हां है तो समझिये आपकी मुराद पूरी हो गयी।

अब आप अपने फायरफॉक्स की सूरत (theme) बदल सकते हैं

मॉज़िला लैबस् ने फायरफॉक्स का परसोनास् नाम का नया प्रसार निकाला है। इसे फायरफॉक्स में जोड़ें और मन पसन्द सूरत (theme) पायें।

आप को तो मालुम ही है कि मुझे तो शान्ति से ही चिपकना पसन्द है। इसीलिये मैंने तो अपने फायरफॉक्स में शान्ति (tranquility) नाम की सूरत (theme) डाली है। देखिये फायरफॉक्स में मेरा पेजफ्लेक कैसा लगता है।

सबसे बायें कॉलम में है मेरा उन्मुक्त हिन्दी चिट्ठों का फीड एग्रेगेटर, दूसरे कॉलम में है आप सबके पॉडकास्ट (यदि किसी का ना हो तो कृपया बता दें ताकि मैं जोड़ दूं), तीसरे कॉलम में है मेरे और मेरी पत्नी के चिट्ठे और चौथे में है मेरे पसन्दीदा कुछ अन्य वेबसाइट।

मैं जानता हूं कि आप यहां यह शीर्षक पढ़ कर फायरफॉक्स के बारे में पढ़ने नहीं आये थे आप तो दाग फिल्म में तलत महमूद का गाना सुनने आये थे जो कि दिलीप कुमार पर फिलमाया गया था। यह गाना यदि आप  अल्पना जी की आवाज में सुनना चाहें तो यहां जा कर सुन सकते हैं। मूल गाना सुनने के लिये यहां चटका लगायें और देखना चाहते हैं तो यहां देखें

हिन्दी में नवीनतम पॉडकास्ट Latest podcast in Hindi

(सुनने के लिये चिन्ह शीर्षक के बाद लगे चिन्ह ► पर चटका लगायें यह आपको इस फाइल के पेज पर ले जायगा। उसके बाद जहां Download और उसके बाद फाइल का नाम अंग्रेजी में लिखा है वहां चटका लगायें।: Click on the symbol ► after the heading. This will take you to the page where file is. Click where ‘Download’ and there after name of the file is written.)

  • विज्ञान कहानियों के जनक जुले वर्न
  • अंतरजाल की माया नगरी की नवीनतम कड़ी: ग्रॉकस्टर केस में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का फैसला

यह ऑडियो फइलें ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप -

  • Windows पर कम से कम Audacity, MPlayer, VLC media player, एवं Winamp में;
  • Mac-OX पर कम से कम Audacity, Mplayer एवं VLC में; और
  • Linux पर सभी प्रोग्रामो में - सुन सकते हैं।

बताये गये चिन्ह पर चटका लगायें या फिर डाउनलोड कर ऊपर बताये प्रोग्राम में सुने या इन प्रोग्रामों मे से किसी एक को अपने कंप्यूटर में डिफॉल्ट में कर ले।

सांकेतित शब्द

Internet, technology, सूचना प्रद्योगिकी, सॉफ्टवेयर, सॉफ्टवेर, सॉफ्टवेर, सौफ्टवेर, आईटी, अन्तर्जाल, इंटरनेट, इंटरनेट, टेक्नॉलोजी, टैक्नोलोजी, तकनीक, तकनीक, तकनीकी,

पेटेंट, बौद्धिक सम्पदा अधिकारों में सबसे महत्वपूर्ण है और शायद सबसे मुश्किल भी। मैंने इसके बारे में तीन श्रंख्ला पेटेंट, पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम, पेटेंट और पौधों की किस्में एवं जैविक भिन्नता अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर की है। इनकी पहली कड़ी यहां, यहां, और यहां और अन्तिम कड़ी यहां, यहां, और यहां हैं। इसके बाद इन्हें संकलित कर, अपने लेख चिट्ठे पर पेटेंट, पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम, और पेटेंट और पौधों की किस्में एवं जैविक भिन्नता नाम से चिट्ठियां पोस्ट की हैं।

कंप्यूटर प्रोग्राम पेटेंट कराने के बारे में अलग-अलग देशों के नियम भी भिन्न हैं। यह पेटेंट विषय में, सबसे विवादास्पद विषय है और इसमें सबसे विवादास्पद है कि क्या कंप्यूटर के द्वारा व्यापार करने के तरीके को क्या पेटेंट कराया जा सकता है, यदि हां तो कब? यह सारा विवाद शुरु हुआ है अमेरिकी अपीली न्यायालय के द्वारा स्टेट स्ट्रीट केस (State Stree Bank vs Signature Finencial Group 149 F3d ,1352) केस में दिये गये फैसले के कारण। इसमें न्यायालय ने कहा कि,

‘कोई प्रक्रिया पेटेंट करने योग्य है या नहीं, यह इस पर नहीं तय होना चाहिए कि प्रक्रिया व्यापार करती है पर यह देखना चाहिये कि, पेटेंट की जाने वाली प्रक्रिया एक उपयोगी तरीके से प्रयोग की जा रही है अथवा नहीं।’

इसके बाद अमेरिका में व्यापार के तरीकों के के लिए दिये पेटेंटों की बाढ़ सी आ गयी। इसके कुछ उदाहरण है :

  • सामान खरीदने की स्वीकृत देने के लिये एक क्लिक का प्रयोग करना (मैंने आपको अपनी चिट्ठी ‘एक अकेला भी बहुत कुछ कर सकता है‘ में बताया है कि कैसे एक व्यक्ति ने एक क्लिक का प्रयोग करने के पेटेंट को कुछ हद तक रद्द करवाया है);
  • लेखा लिखने की एक आन-लाइन पद्धति;
  • आन-लाइन पारिश्रमिक प्रोत्साहन पद्धति;
  • आन-लाइन बारम्बार क्रेता कार्यक्रम; और
  • उपभोक्ता को अपने दिये गये दाम पर सर्विस की सूचना प्राप्त करने की सुविधा।

लेकिन, शायद यह अब बदल जाय।

१ अक्टूबर २००७ को, ‘In re Bilski case‘, में अमेरिका की अपीली न्यायालय ने यह सवाल उठाया है

बिलस्कि के मुकदमे में, बहस और निर्णय का बेसब्री से इंतजार है

कि क्या स्टेट स्ट्रीट केस केस ठीक से निर्णीत हुआ अथवा नहीं। अपीली न्यायालय, इस सवाल को, अन्य चार सवालों के साथ, एक बड़ी पीठ के समक्ष पुनः अगले माह सुनेंगे। ऐसा हो सकता है कि न्यायालय इस बार दूसरा रुख अपनाये। यदि ऐसा होता है तो कंप्यूटर प्रोग्राम के संबन्ध में, पेटेंट का कानून ही बदल जायगा। इस मुकदमें में लोग न्यायालय के मित्र की तरह बहस (यहां और यहां देखें) दाखिल कर रहे हैं। इस मुकदमे में बहस और निर्णय का बेसब्री से इंतजार है।

इंगलैंड में कंप्यूटर प्रोग्राम के संबन्ध में, पेटेंट के कानून में एक निर्णय के द्वारा कुछ बदलाव आया है यह अगली बार।

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बताये गये चिन्ह पर चटका लगायें या फिर डाउनलोड कर ऊपर बताये प्रोग्राम में सुने या इन प्रोग्रामों मे से किसी एक को अपने कंप्यूटर में डिफॉल्ट में कर ले।

सांकेतित शब्द

Internet, technology, Science, सूचना प्रद्योगिकी, सॉफ्टवेयर, सॉफ्टवेर, सॉफ्टवेर, सौफ्टवेर, आईटी, अन्तर्जाल, इंटरनेट, इंटरनेट, टेक्नॉलोजी, टैक्नोलोजी, तकनीक, तकनीक, तकनीकी,

नहीं भाई, नहीं। मेरी शादी नहीं हुई थी। उसे तो तीन दशक बीत गये हैं, वह तो इतिहास है।

‘अरे तो फिर क्या हुआ था।’

नहीं मालुम। दस साल पहले, ३१ मार्च १९९८ को मॉज़िला अधिकारिक रूप से शुरू किया गया था

mozilla_mascot.png

मॉज़िला का लोगो

मॉज़िला इस समय तीन बेहतरीन ओपेन सोर्स प्रोग्राम चलाता है। यह तीनो मॉज़िला पब्लिक लाइसेन्स के अन्दर प्रकाशित हैं, जो कि एक ओपेन सोर्स लाइसेन्स है।

firefox-logo.png फायरफॉक्स - यह वेब ब्रॉउज़र है,

thunderbird-logo.png थंडरबर्ड - यह ई-मेल भेजने और प्राप्त करने के सॉफ्टवेर है।

sunbird-logo.png सनबर्ड - यह ई-मैनेजर है। आपको यह प्रिय जनों का जन्मदिन, शादी की सालगिरह की याद दिलाता है।

‘उन्मुक्त जी, आप कह रहे हैं तो अवश्य यह केवल लिनेक्स पर ही चलते होंगे। हम तो विंडोज़ वाले हैं। हमको इन प्रोग्रामों से क्या मतलब। तंग मत किया करिये।’

नहीं नहीं यह सच नहीं है। इनकी खासियत यही है कि यह सब ऑपरेटिंग सिस्टम पर चलते हैं। विंडोज़ पर तो बहुत बढ़िया चलते हैं। जो मुझसे लिनेक्स पर काम करने की सलाह पूछता है मैं उनसे कहता हूं कि पहले विंडोज़ में इन प्रोग्रामों में काम करो। उसके बाद लिनेक्स में काम करने में कोई मुश्किल ही नहीं होगी।

थंडरबर्ड में फीड स्थापित की जा सकती है। अपने प्रिय फीड एग्रेगेटर की या फिर अपने प्रिय चिट्ठों की। देर किस बात की - यहां से डाउनलोड करें।

सनबर्ड में अपनी पत्नी का जन्मदिन जरूर डाल लें ताकि वह हमेशा याद रहे। क्या कहा शादी नहीं हुई है तो महिला मित्र का ही जन्म दिन डाल लें। सनबर्ड आपके थंडरबर्ड के साथ भी स्थापित हो सकता है। मैंने इसे ऐसे ही स्थापित कर रखा है। इसको डाउनलोड करने के लिये यहां जाईये।

फायरफॉक्स के बारे में भी क्या बताने की जरूरत है। चलिये बाकी के बारे में बता रहा हूं तो इसके बारे में बता देता हूं। यह हिन्दी चिट्टाकारों के लिये कुछ खास है और यहां से डाउनलोड कीया जा सकता है।

देरी मत कीजिये - आपको मालुम नहीं कि आप क्या मिस कर रहें हैं।

सांकेतित शब्द

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‘वाह जी वाह, क्या बात है। मुफ्त बांटा जाय और पैसा कमाया जाय। लगता है कि उन्मुक्त जी पर होली का नशा नहीं उतरा है।’

चलिये मैं आपको कुछ दिन पहले अफ्रीका के एक वित्तीय संस्थान के अफसर की बात बताता हूं। उसने कहा कि, आजकल उनके वित्तीय संस्थान का काम बहुत अच्छा चल रहा है। लोगों को आश्चर्य हुआ। उन्होने इसका कारण कुछ यह बताया।

‘अफ्रीका में लोग बैंकों में दो कारणों से पैसा नहीं रखते हैं।

  • उनके पास बैंक में रखने के लिये पैसा नहीं है
  • उनके पास सूचना का आभाव है।

वहां पर अधिकतर लोग किसान हैं। लोग उनसे सस्ते में गल्ला खरीदते हैं फिर शहर के बज़ार में महंगे में बेच देते हैं। वित्तीय संस्थानों ने सबको मोबाईल फोन मुफ्त में बाटें। इस कारण वे शहर में फोन के द्वारा सही दाम पता कर लेते हैं और लोगों से अपनी फसलों के सही दाम मांगते हैं। इस तरह से लोगों के पास पैसा आने लगा, वे बैंकों में खाते खुलवाने लगे और पैसा रखने लगे।’

इस तरह की कुछ बात मुझे केरल में भी सुनायी पड़ी। वहां मछुवारे मछली पकड़ते ही मोबाइल से दाम मालुम करने लगते हैं और वहीं अपनी नाव ले जाते हैं जहां मछली के लिये सबसे अच्छे दाम मिले।

ओपेन सोर्स की भी यही कहानी है। लोग अक्सर सोचते हैं कि ओपेन सोर्स पर किसी एक का मालिकाना हक होना संभव नहीं है; इसके लिये पैसा नहीं लिया जा सकता है - इसलिये इससे पैसा नहीं कमाया जा सकता। यह सोच गलत है। ओपेन सोर्स सॉफ्टवेयर मुफ्त बांटने का यह मतलब नहीं है कि इससे पैसा नहीं कमाया जा सकता। यह उसी तरह की युक्ति है जैसी कि अफ्रीका के वित्तीय संस्थानों ने की।

ओपेन सोर्स में, पैसा कमाने का तरीका, मालिकाना सॉफ्टवेयर से अलग है। शायद, यही बेहतर तरीका है। इसलिये एक्सट्रामॅड्यूरा (Extremadura) में ओपेन सोर्स को बढ़ावा दिया जा रहा है।

एक्सट्रामॅड्यूरा, स्पेन का स्वाशासित (autonomous) पश्चमी भाग है

‘एक्सट्रामॅड्यूरा (Extremadura)? भईये, यह किस जगह का नाम है?’

एक्सट्रामॅड्यूरा, स्पेन का स्वाशासित (autonomous) पश्चमी भाग है। इतिहास ने इसे हमेशा नज़र अन्दाज़ किया पर अब वह उपेक्षित नहीं रहना चाहता - इसलिये उसने तय किया है कि वह ओपेन सोर्स को बढ़ावा देगा। उन्होने अपने लिये लिनेक्स का नया वितरण लिनएक्स (LinEx) निकाला है। यह लिनेक्स के डेबियन (Debian) वितरण को अपनी जरूरतों को देखते हुऐ बदला गया है। सारे शिक्षा संस्थनो में केवल इसी का प्रयोग हो रहा है। उनके सात लाख डेस्कटॉप और चार सौ सर्वर केवल लिनेक्स में ही चल रहे हैं।

linex-mascot-stork.jpg

एक्सट्रामॅड्यूरा में लिनएक्स का मंगलकारी चिन्ह (Mascot) सटॉर्क (Stork) चिड़िया है।

stork-fly-high.jpg

यह इसलिये कि वे सोचते हैं जिस तरह से यह चिड़िया आकाश में ऊंचे उड़ सकती है, ओपेन सोर्स के जरिये वे भी ऊंचे उठ पायेंगे।

यह और क्या, क्या कर रहें हैं, किस प्रकार कर रहे हैं - यह आप स्वयं यूरोन्यूस् (EuroNews) की इस क्लिप में देख लिजिये।

सांकेतित शब्द

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Stork, Extremadura, Linux, LiNex,

gazal.jpg

‘मैं ग़ज़ल हूं। मैं २४ साल पुरुष शरीर के अन्दर, कैद रही :-( शल्यचिकित्सा से आज़ाद हुई। बहुत समय निकल गया, बहुत कुछ रह गया, छूट गया, बहुत कुछ पाना है - कपड़े, चूड़ियां, बालियां, मेकअप पर मैंने जीवन की सबसे महत्वपूर्ण चीज़ पा ली - जो अक्सर लोगों से छूट जाती है - ज़िंदगी :-)

लिङ्ग डिज़िटल नहीं होता इसे आप दो भाग में नहीं बांट सकते हैं। इसके कुछ रूप और भी हैं। मैंने कुछ समय पहले अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर ‘Trans-gendered – सेक्स परिवर्तित पुरुष या स्त्री‘ नामक चिट्ठी में उन लोगों की चर्चा की थी जिन्हें प्रकृति अलग तरह से बनाती है - मस्तिष्क, लिङ्ग का देती है और शरीर, दूसरे लिङ्ग का। इस चिट्ठी में मैंने इन लोगों की परेशानियों के बारे में लिखा था और एक टीवी कंपनी के ओछे विज्ञापन का जिक्र किया था, जिसके खिलाफ कुछ लिखा पढ़ी की। हमारा समाज ऐसे लोगों की पीड़ा समझना तो दूर, इनका मजाक बनाने मे भी पीछे नहीं रहता। मैंने इसी तरह के विचार शास्त्री जी इस चिट्ठी पर भी दिये थे।

ग़ज़ल चंडीगढ़ में, गुनराज़ नाम का लड़का थीं। लड़के के रूप में, इंजीनियर बनी। पिछले साल, शल्यचिकित्सा के द्वारा स्वतंत्र की गयीं। उन्होने अपनी यह भावनात्मक यात्रा, बेहतरीन तरीके से ‘द वीक‘ पत्रिका ने ९ मार्च के अंक पर लिखी है। यदि आपने यह नही पढ़ी हो तो यहां जा कर अवश्य पढ़ें। इस चिट्ठी में प्रकाशित ग़ज़ल के चित्रों को श्री संजय अहलवात ने खींचा है। यह तीनों चित्र ‘द वीक’ के उसी लेख से, उसी पत्रिका के सौजन्य से हैं।

‘उन्मुक्त जी, तीन चित्र? यहां तो एक ही है’

जी हां, मैंने तीन चित्रों को जोड़ कर एक किया। उसके बाद उसका आकार और पिक्सल कम करके यहां प्रकाशित किया है। यह सारा काम मैंने जिम्प (GIMP) प्रोग्राम से किया है। यह न केवल मुफ्त है पर मुक्त भी। यह सारे ऑपरेटिंग सिस्टम में चलता है और बेहतरीन प्रोग्राम है। जी हां, यह विंडोज़ पर भी चलता है। यह हमारी सारी जरूरतों को पूरा करता है। यदि यह आपके पास यह है तो आपको फोटोशॉप खरीदने की या फिर … करने की कोई जरूरत नहीं। आप एक बार स्वयं ,इस पर काम करके क्यों नहीं देखते।

‘उन्मुक्त जी, एक बात समझ में नहीं आयी?’

अरे, शर्माना कैसा, तुरन्त पूछिये।

‘आप घूम फिर कर ओपेन सोर्स पर क्यों पहुंच जाते हैं?’

सांकेतिक शब्द

culture, life, Sex education, जीवन शैली, समाज, कैसे जियें, जीवन दर्शन, जी भर कर जियो, दर्शन, यौन शिक्षा,

‘उन्मुक्त जी, ओपेन सोर्स तो सुना था पर फॉस क्या होता है?’

फ्री सॉफ्टवेयर और ओपेन सोर्स सॉफ्टवेयर में कुछ अन्तर होता है पर मोटे तौर पर यह शब्द एक ही तरह से प्रयोग किये जाते हैं। इसलिये इन्हें Free/ Open Source Software (FOSS) या फिर Free/Libre Open Source Software (FLOSS) कहा जाता है। इसे ठीक से समझने के लिये मेरा लेख ‘ओपेन सोर्स सॉफ्टवेयर‘ पढ़ें।

यही तो ओपेन सोर्स के साथ सबसे बड़ी मुश्किल है। इसके बारे में शुरू से बताना पड़ता है। कम ही लोग इसके बारे में जानते हैं। इसीलिये मैं इसके बारे में लिखता हूं।

ओपेन सोर्स के बारे में सूचना प्राप्त करने के लिये एक बेहतरीन मासिक पत्रिका लिनेक्स फॉर यू (Linux for you) निकलती है। यह आपको ओपेन सोर्स के बारे न केवल नवीनतम सूचना देती है पर यह आपको हर महीने नवीनतम ओपेन सोर्स सॉफ्टवेयर की सीडी भी भेजती है ताकि आपको उसे डाउनलोड करने की परेशानी न उठानी पड़े।

ओपेन सोर्स इंडिया सप्ताह दिल्ली (Open Source India Week, Delhi) में चल रहा है। इसी के दौरान, १५ फरवरी को, लिनेक्स फॉर यू के संपादक ने फॉस इंडिया एवार्ड (FOSS India Awards) की घोषणा की। इसके लिये २० परियोजनाओं (projects) को चुना गया है।

ओपेन सोर्स को सही दिशा मिले, यह तरक्की करे, लोगों को इसके बारे में ठीक से पता चल सके - इसलिये भारत सरकार के सूचना प्रद्योगिकी विभाग ने National Resource Centre for Free/Open Source Software (NRCFOSS) की स्थापना की है। यह ओपेन सोर्स को बढ़ावा देने कार्यरत है। NRCFOSS ने इस साल फॉस इंडिया एवार्ड को प्रायोजित (sponsored) किया है। इसमें प्रत्येक परियोजना को २५,००० रुपये का पुरुस्कार (कुल ५ लाख) मिलेगा। निम्न २० परियोजनाओं को इस पुरुस्कार के लिये चुना गया है

  1. Hindawi Indic Programming System
  2. Zmanda Recover Manager for MySQL
  3. Dhvani Indian Language Text to Speech System
  4. Fedora (games and localization spins)
  5. केडीई 3.5 हिन्दी परियोजना में हिन्दी अनुवाद का पूरा कार्य तो अपने रवी जी ने किया है। वे बधाई के पात्र हैं।

  6. KDE 3.5 Hindi
  7. MayaVi
  8. Jtrac
  9. DeepOfix
  10. Tuxtype
  11. WanEM
  12. Mac4Lin
  13. OpenLX
  14. Anjuta
  15. HarvestMan
  16. Get it I say
  17. KIWI-LTSP
  18. Ffmpeginstall
  19. Belenix
  20. TVTK: Traited VTK
  21. GNUSim8085

 

(रवी जी - तकनीक और हिन्दी के गुरू)

‘उन्मुक्त जी, यह तो बढ़िया है पर आपने इनमें से केवल एक (केडीई 3.5 हिन्दी) ही को क्यों बोल्ड और बड़े शब्दों में किया है। लगता है कि कनफ्यूज़ हो गये हैं।’

अरे नहीं भाई, नहीं बहना - यह तो मैंने जान बूझ कर बोल्ड किया है। आपको मालुम नहीं, शायद मुझसे बेहतर तरीके से मालुम है कि केडीई 3.5 हिन्दी परियोजना में हिन्दी अनुवाद का पूरा कार्य तो अपने रवी जी ने किया है। वे बधाई के पात्र हैं। रवी जी को बधाई देने के लिये यहां ई-मेल करें, या उनके चिट्ठे पर टिप्पणी करें, या उनके चिट्ठी पर बातचीत के लिये बॉक्स पर बधाई छोड़ें।

‘उन्मुक्त जी, क्या यह काम उन्होंने किसी फेलोशिप पर किया है।’

शायद हां, शायद नहीं, मालुम नहीं … मैं नहीं कह सकता, - अरे, अफलातून जी से क्यों नहीं पूछते :-) शायद इसी बहाने वे मेरे चिट्ठे पर आयें।

बीसवीं शताब्दी भौतिक शास्त्रियों की थी। यदि आप में दुनिया बदलने की दम-खम थी, आप दुनिया बदलना चाहते थे तो आपका विषय था - भौतिक शास्त्र। पिछली शताब्दी के बेहतरीन मस्तिष्क वालों ने इसी विषय पर काम करना पसन्द किया पर इस शताब्दी के समाप्त होते होते ही, यह बदल गया। इक्कीसिवीं शताब्दी है जीव वैज्ञानिकों की, पर्यावरणविदियों की।

मैंने उच्च शिक्षा १९६० के दशक में ली - भौतिक शास्त्री बनने के सपने देखे। ईश्वर तो कुछ और ही चाहते थे - मैं फाइलें ईधर उधर पलटने वाला बन गया। विद्यार्थी जीवन में विज्ञान की अच्छी पत्रिका साईंटिफ्कि अमेरिकन (Scientific American) आया करती थी। मैं उसका नियमित ग्राहक था। विज्ञान विषय छोड़ते के बाद, मैंने विज्ञान से संबन्ध तो रखा पर इस पत्रिका को लेना बन्द कर दिया। इसे अमेरिका से मंगवाना पड़ता था - १९६० के दशक में न केवल यह मंहगा था पर मुश्किल भी।

scientific-american.jpg

कुछ सालों से साईंटिफ्कि अमेरिकन पत्रिका अब भारत में निकलने लगी है। मैं इसके भारत में निकलने के समय से ही इसका नियमित ग्राहक हूं और इसमें निकलने वाले लेखों में अन्तर देखता हूं। अब काफी लेख जीव विज्ञान और पर्यावरण पर होते हैं।

terragreen.jpg

अपने देश में, इस समय दो अन्य पत्रिकायें पर्यावरण पर निकल रहीं हैं।

मैं इन दोनो पत्रिकाओं का भी नियमित ग्राहक हूं।

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यह तीनो अच्छी पत्रिकायें हैं। यदि आपको इन विषयों पर रुचि है तो इनके ग्राहक बने। यहां मैं इतना कहना चाहूंगा कि साईंटिफ्कि अमेरिकन के लिये विज्ञान का कुछ ज्ञान होना जरूरी है। डाउन टू अर्थ तथा टॅराग्रीन में भी इन विषयों का कुछ ज्ञान जरूरी है पर साईंटिफ्कि अमेरिकन के बराबर नहीं। डाउन टू अर्थ तथा टॅराग्रीन में, मुझे डाउन टू अर्थ ज्यादा पसन्द आती है।

पर्यावरण विषय तो हिन्दी चिट्ठाकारी से भी नहीं अछूता है। इस पर दो चिट्ठे भी हैं एक है पर्यावरण डाइजेस्ट, जो कि सन् १९८७ से निरंतर प्रकाशित, पर्यावरण पर पहली राष्ट्रीय हिन्दी मासिक है; दूसरा है पर्यानाद्। इन दोनो चिट्ठों के महत्व को नकारा नहीं जा सकता है। इन पर भी नज़र डालते चलिये।
हमें भूलना नहीं चाहिये,

यह पृथ्वी मां हमें अपने पूर्वजों से नहीं मिली है,
इसे हमने अपनी अगली पीढ़ी से उधार ले रखा है।

मैं समलैंगिक रिश्तों का हिमायती नहीं हूं पर ऐसे लोगो को हेय दृष्टि से देखना, या उनके साथ भेदभाव करना, गलत समझता हूं।

कुछ व्यक्ति, दो लिंगों के बीच फंस (intersex) जाते हैं। मैं ऐसे लोगों का मजाक बनाना गलत समझता हूं। मेरे विचार से लिंग डिज़िटल नहीं होता। इसे दो भागों में नहीं बांटा जा सकता हैं। इसके कुछ और रूप भी हैं। जो हर युग में, हर जगह, हर सभ्यता में पाये जाते हैं। मेरे विचार से ईश्वर - शायद प्रकृति कहना उचित होगा - इन्हें इसी तरह से बनाया है। इन्हे हास्य का पात्र बनाना अनुचित है। हमें इन्हें ऐसे ही स्वीकर करना चाहिये।

इस सब के साथ, मैं यौन शिक्षा का भी हिमायती हूं। मेरे विचार से, इसकी प्ररंभिक शिक्षा घर में ही होनी चाहिये। यह आजकल खास तौर से जरूरी है जब अंतरजाल में सब तरह की ब्लू फिल्म देखने को आसानी से मिल जाती है। टीवी के प्रोग्राम भी कुछ कम नहीं हैं।

time.jpg

यही कारण है कि मैंने अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर चार चिट्ठियां ‘Trans-gendered – सेक्स परिवर्तित पुरुष या स्त्री‘, ‘यहां सेक्स पर बात करना वर्जित है‘, ‘यौन शिक्षा‘,’ यौन शिक्षा और सांख्यिकी‘, नाम से लिखीं। छुट-पुट चिट्ठे पर भी तीन चिट्ठियां ‘चार बराबर पांच, पांच बराबर चार, चार…‘, ‘आईने, आईने, यह तो बता - दुनिया मे सबसे सुन्दर कौन‘, ‘मां को दिल की बात कैसे बतायें‘ लिखीं। हां, ‘मां को को दिल की बात पता चली‘।
इन चिट्ठियों का संदर्भ कुछ अलग, अलग है। इसलिये यह यौन शिक्षा, जैसा हम समझते हैं, वैसी नहीं हैं पर इनमें यौन शिक्षा का महत्व या भ्रांतियों को अलग, अलग तरह से बताने का प्रयत्न किया है।

यौन शिक्षा‘ की चिट्ठी पर मैं एक कविता पर दुख, आक्रोश प्रगट कर, यह कहने का प्रयत्न कर रहा था कि बच्चों को ही नहीं, पर बड़ो को भी यौन शिक्षा की जरूरत है और महिला या बालिका शोषण का हल, बालक शोषण नहीं है। बालक भी, उतने ही यौन शोषण के शिकार होते हैं जितना कि बालिकायें या फिर महिलायें - शायद उनसे ज्यादा। आज के दैनिक जागरण की यह खबर कुछ इस तरफ इशारा करती है।

सांकेतिक शब्द

culture, life, जीवन शैली, समाज, कैसे जियें, जीवन दर्शन, जी भर कर जियो,

तरकश के द्वारा पिछले वर्ष से सर्वश्रेष्ट चिट्टाकार का चुनाव शुरू किया गया। पिछले साल पुरुस्कार मिलने पर, मैंने आभार प्रगट करते समय कहा था,

‘मुझे एक बात का दुख भी है। हमारे साथ कोई महिला चिट्ठाकार नहीं है।
मुझे मुन्ने की मां को कई बार कहना पड़ता है तब वह कोई चिट्ठी पोस्ट करती है। जब मैं उससे पूछता हूं कि वह और चिट्ठियां क्यों नहीं पोस्ट करती, तो उसका जवाब रहता है कि,

  • कंप्यूटर तुम्हारा ज्यादा अच्छा मित्र है; या
  • घर का काम कौन करेगा; या
  • मुझे कंप्यूटर कम समझ में आता है।

कभी कभी वह कुछ मुश्किल में पड़ जाती है और मेरे पास उसे बताने का समय नहीं होता। शायद महिलाओं कि एक अलग श्रेणी भी रखी जानी चाहिये।’

उस समय मेरे सुझाव - महिलाओं की अलग श्रेणी बनायी जाय - पर कुछ चिट्टाकार बन्धुवों को आपत्ति थी। इस साल भी है पर मुझे प्रसन्नता है कि मेरे इस सुझाव को चुनाव आयोजकों ने मान लिया। मेरे विचार से यह सही कदम है।

vote.jpg

इस साल नामांकन हो गया है, वोटिंग शुरू हो गयी है। पिछले साल न मैंने, न ही मुन्ने की मां ने ही वोट दिया था। मैंने, इसका कारण भी उसी चिट्ठी में स्पष्ट किया था,

‘यह इस कारण से नहीं कि हमें इस चुनाव में कोई दिलचस्पी नहीं, पर इसलिये कि हम इस चुनाव में निष्पक्ष रहना चाहते थे। मैं तो मुन्ने की मां के अलावा किसी और को वोट दे ही नहीं सकता था, न ही देने की हिम्मत थी :-)

इस बार तो कोई इस तरह की बन्दिश नहीं थी। मैं इसमें उम्मीदवार नहीं हूं। मैंने तो आज सुबह ही - इसके पहले कोई मेरा फर्जी वोट डाले - अपना बहुमूल्य वोट डाल दिया। आपने वोट डाला कि नहीं? क्या कहा नहीं डाला! अरे क्या मजाक करते हैं। तुरन्त डालें, कहीं कोई और न डाल दे :-) वोट डालने के लिये यहां जांय।

पुरुस्कारों के लिये यहां देखें। बहुत से लोग पुरुस्कार दे रहें हैं। यहां एक पुरुस्कार रचना जी की बेटी, पूर्वी की याद में है। यह क्यों है इसे आप यहां पढ़ सकते हैं।

 

इस चिट्ठी में प्रकाशित चित्र पर मेरा कॉपीराइट नहीं है। मैंने इसे यहां से लिया है और इन्हीं के सौजन्य से है।

The photograph published is not mine. I have taken it from here and it is courtsey them.

Hi, I am using it for non profit purpose. Pease do let me know if you have any objection. In that event, I will remove it.

गुलाबी रंग तो प्रेम और रोमांस का रंग समझा जाता है। मैं भी इसे इसी तरह से लेता हूं पर बांदा की गुलाबी महिलाओं का रोमांस तो कुछ और ही है।

‘बांदा…? क्या इस नाम की कोई जगह है?’

उत्तर प्रदेश का शायद इसका सबसे पिछड़ा भाग बुन्देलखंड है। बांदा इसी का एक जिला है। यहां का मुख्य पेशा फौजदारी है। कुछ समय पहले वहां कुख्यात डाकू ददुवा का रहा करता था। बिना उससे आशिर्वाद लिये, वहां से, न तो कोई एम.एल.ए. बन सकता था, न ही एम.पी.। वह मारा गया है। अब यह ठोकिया का इलाका है। देखिये अगले चुनाव में क्या होता है।

बांदा की गुलाबी महिलायें - सरकार के भ्रष्ट, घूसखोर अफसरों और उजड्ड पुरुषों - के खिलाफ आवाज उठा रही हैं। वे न तो गैर सरकारी संस्था पर विश्वास करती हैं, न ही अफसरशाही पर। उनके अनुसार या अफसरशाही घूस में व्यस्त है और गैर सरकारी संस्था पैसे कमाने में। वे अपनी लड़ाई स्वयं लड़ रही हैं और महिलाओं को न केवल सम्मान दिलवा रही हैं पर सबका सम्मान भी पा रही हैं।

मैंने कुछ दिन पहले आज की दुर्गा नाम से कई कड़ियों में एक श्रंखला अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर लिखी थी, जिसकी पहली कड़ी यहां और अन्तिम यहां है। इसके बाद उसे सम्पादित कर ‘आज की दुर्गा नाम - महिला सशक्तिकरण‘ से अपने लेख चिट्ठे में रखी है। वास्तव में, महिला सशक्तिकरण तो बांदा कि यह गुलाबी महिलायें ही हैं।

‘यह सब तो ठीक है पर आप उन्हें गुलाबी महिलायें क्यों कह रह हैं?’

क्योंकि वे गुलाबी रंग की धोतियां पहनती हैं :-)

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(और अधिक जानकारी के लिये बीबीसी यह रिपोर्ट पढ़ें यह चित्र वहीं से है और उनके सौजन्य से है)

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