१०० रातों का वायदा, चला ३२१८ रातें

इस चिट्ठी में ऐलिस ऑज़मा के द्वारा लिखित पुस्तक  ‘द रीडिंग प्रॉमिस’ के बारे में चर्चा करते हुऐ बच्चों में पुस्तक प्रेम जगाने के तरीके के बारे में चर्चा है।

कुछ समय पहले ‘ई-पाती‘ श्रृंखला में एक चिट्ठी ‘बच्चे व्यवहार से सीखते हैं, न कि उपदेश से‘ नाम से लिखते हुऐ चर्चा की थी कि

‘मेरे विचार से किताबें पढ़ना एक शौक है। आप किसी से जबरदस्ती नहीं कर सकते।

मेरा बेटे को यह शौक बचपन में नहीं था न ही हमने उसे किताबें पढ़ने के लिये कहा। मेरे बेटे को जानवरों, जंगलों में रुचि थी। हम हमेशा छुट्टियों में किसी न किसी जंगल में जाते थे। उसने सब तरह के जानवर भी पाले। जिसमें हमारा सहयोग रहता था। मैं उसे अक्सर जंगलों या जिम कॉर्बेट के बारे में बताया करता था और कम से कम महीने में दो बार किताबों की दुकान पर ले जाता था। उसे कोई पुस्तक खरीदने की छूट थी।

मेरे बेटे ने पहले अपने आप जानवरों के चित्रों वाली पुस्तकें खरीदने की इच्छा जाहिर की। फिर जेरॉल्ड डरल (Gerald Durrell) और जिम कॉर्बेट (Jim Corbett) की पुस्तकें खरीदने की। हमने वे सब पुस्तकें खरीदी। उसने उन्हें पढ़ा भी धीरे धीरे अपने आप ही उसे पुस्तकें पढ़ने का शौक हो गया आज हम अक्सर अच्छी पुस्तकों के बारे ई-मेल से बात करते हैं। वह जब भारत आता है तो अपने साथ अमेरिका पुस्तकें ले जाता है कहता है कि यहां सस्ती मिलती हैं।’

यह एक तरीका है जिससे ,मैंने अपने बेटे को पुस्तकें पढने के लिये प्रेरित किया।

मेरी मां ने, हमारे साथ दूसरा तरीका अपनाया था। इसकी चर्चा मैंने अपनी श्रृंखला ‘हमने जानी है रिश्तों में रमती खुशबू‘ की चिट्ठी ‘अम्मां – बचपन की यादों में‘ लिखते समय की है,

‘मां की अंग्रेजी बहुत अच्छी थी। वे अंग्रेजी के महत्व को समझती भी थीं। वे हमें बीबीसी सुनने के लिये प्रेरित करती।

प्रतिदिन शाम को, हम सब भाई-बहनों को उन्हें अंग्रेजी की कोई न कोई कहानी रीडर्स डाइजेस्ट से या फिर अंग्रेजी का अखबार पढ़ कर सुनाना पड़ता था। वे हमारा उच्चारण ठीक करती और अर्थ समझाती थीं। किसकी बारी पड़ेगी यह तो हम लोग यह खेल से ही निकालते थे,

अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बोल,
अस्सी नब्बे पूरे सौ।
सौ में लगा धागा,
चोर निकल भागा।

बस जिस पर ‘भागा’ आया उसे ही पढ़नी पड़ती थी।

उन्होने, हमें पुस्तकें खरीदने से कभी नहीं रोका। इसके लिये उनके पास हमेशा पैसा रहता था। शायद हम सब के पुस्तक प्रेम का कारण, इस तरह से व्यतीत की गयी अनगिनत शामें है।’

कुछ समय पहले मुझे ऐलिस ऑज़मा (Alice Ozma) के द्वारा लिखित ‘द रीडिंग प्रॉमिस’ (The Reading Promise) के बारे में पढने को मिला। यह पुस्तक एक पिता का अपनी पुत्री के साथ किये गये उस वायदे का वर्णन है जो उसने तब किया जब बेटी चौथी कक्षा में थी। यह वायदा था कि वह १०० रातों को लगातार अपनी बेटी को कहानियां पढ़ कर सुनायेगा।

यह वायदा १०० दिन तक न चल कर ३२१८ रातों तक चला जब तक बेटी विश्वविद्यालय में पढ़ने नहीं चली गयी। यह भी  अपने आने वाली पीढ़ियों में पुस्तक प्रेम जागृत करने का बेहतरीन तरीका है। इसके बारे में आप विस्तार से यहां पढ सकते हैं। और नीचे चटका लगा कर सुन सकते हैं।

http://www.npr.org/v2/?i=137223191&m=137265754&t=audio

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के बारे में उन्मुक्त
मैं हूं उन्मुक्त - हिन्दुस्तान के एक कोने से एक आम भारतीय। मैं हिन्दी मे तीन चिट्ठे लिखता हूं - उन्मुक्त, ' छुट-पुट', और ' लेख'। मैं एक पॉडकास्ट भी ' बकबक' नाम से करता हूं। मेरी पत्नी शुभा अध्यापिका है। वह भी एक चिट्ठा ' मुन्ने के बापू' के नाम से ब्लॉगर पर लिखती है। कुछ समय पहले,  १९ नवम्बर २००६ में, 'द टेलीग्राफ' समाचारपत्र में 'Hitchhiking through a non-English language blog galaxy' नाम से लेख छपा था। इसमें भारतीय भाषा के चिट्ठों का इतिहास, इसकी विविधता, और परिपक्वत्ता की चर्चा थी। इसमें कुछ सूचना हमारे में बारे में भी है, जिसमें कुछ त्रुटियां हैं। इसको ठीक करते हुऐ मेरी पत्नी शुभा ने एक चिट्ठी 'भारतीय भाषाओं के चिट्ठे जगत की सैर' नाम से प्रकाशित की है। इस चिट्ठी हमारे बारे में सारी सूचना है। इसमें यह भी स्पष्ट है कि हम क्यों अज्ञात रूप में चिट्टाकारी करते हैं और इन चिट्ठों का क्या उद्देश्य है। मेरा बेटा मुन्ना वा उसकी पत्नी परी, विदेश में विज्ञान पर शोद्ध करते हैं। मेरे तीनों चिट्ठों एवं पॉडकास्ट की सामग्री तथा मेरे द्वारा खींचे गये चित्र (दूसरी जगह से लिये गये चित्रों में लिंक दी है) क्रिएटिव कॉमनस् शून्य (Creative Commons-0 1.0) लाईसेन्स के अन्तर्गत है। इसमें लेखक कोई भी अधिकार अपने पास नहीं रखता है। अथार्त, मेरे तीनो चिट्ठों, पॉडकास्ट फीड एग्रेगेटर की सारी चिट्ठियां, कौपी-लेफ्टेड हैं या इसे कहने का बेहतर तरीका होगा कि वे कॉपीराइट के झंझट मुक्त हैं। आपको इनका किसी प्रकार से प्रयोग वा संशोधन करने की स्वतंत्रता है। मुझे प्रसन्नता होगी यदि आप ऐसा करते समय इसका श्रेय मुझे (यानि कि उन्मुक्त को), या फिर मेरी उस चिट्ठी/ पॉडकास्ट से लिंक दे दें। मुझसे समपर्क का पता यह है।

5 Responses to १०० रातों का वायदा, चला ३२१८ रातें

  1. ग्रहण करने योग्य सलाह। थोपी हुई बात का प्रभाव नहीं होता है। बच्चा अपनी रुचि से जो काम करता है उसे संपूर्णता से करता है।

    हमारे देश में पुस्तकों को भगवान के समान आदर दिया जाता है।”विद्या’देवी समान पूजी जाती है। पुस्तकों पर पैर नहीं रखते, यदि भूल से पैर से छू जाए तो मस्तक से लगाकर सम्मान देते हैं।

  2. Hindi SMS says:

    बहुत बढ़िया।

  3. सुंदर विचार।

  4. Cyril Gupta says:

    मेरे पापा का तरीका कुछ इस तरह था:

    जब मुझे ठीक से पढ़ना भी नहीं आता था उस समय से ही मेरे पापा ने लगातार किताबें लाते रहते थें, मैं उन्हें अपनी मम्मी से जिद करके पढ़वाता था. जब तक धीरे-धीरे मैंने पढ़ना सीखा, मेरे पास बहुत सारी किताबें थी़ं. उस समय टीवी पर सिर्फ एक चैनल आता था, तो किताबें पढ़ना मेरे लिये मनोरंजन का मुख्य स्त्रोत बन गया.

    मुझे याद है कि मेरे पास जैको की बच्चों के लिये खास तौर पर बनाई गई साहित्यिक किताबें थी जिन्होंने मेरी रुची अंग्रेजी साहित्य में जगाई और आग मैंने बहुत सी किताबें पढ़ीं. मेरे पापा के पास उस समय बहुत सारे पैसे नहीं थे, इसलिये हम ज्यादातर सेकेन्ड हैन्ड किताबें खरीदते थे, और एक बार उन्होंने मुझे सूटकेस भरके किताबें दिलाई थीं, जिन्हें मैंने बहुत दिनों तक पढ़ा.

    किताबें पढ़ने की आदत ने मुझे बहुत फायदा पहुंचाया है और इसका श्रेय मेरे पापा को है जिन्होंने मुझे किताबें पढ़ने के लिये प्रोत्साहित किया और अपने बहुत सारे पैसे उस समय खर्च किये जब उन्हें उनकी सबसे ज्यादा जरुरत थी.

  5. मीनाक्षी says:

    सौ फीसदी सहमत कि बच्चे व्यवहार सीखते हैं न कि उपदेश से… किताबों में रुचि पैदा करने के लिए कितनी ही रातें बच्चों को सोने से पहले उनकी पसन्द सुनाया करते…बचपन से ही धीरे धीरे शौक पैदा होता गया जो अब तक बरक़रार है..

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