यह जीव विज्ञान और पर्यायवरण की शताब्दी है

बीसवीं शताब्दी भौतिक शास्त्रियों की थी। यदि आप में दुनिया बदलने की दम-खम थी, आप दुनिया बदलना चाहते थे तो आपका विषय था – भौतिक शास्त्र। पिछली शताब्दी के बेहतरीन मस्तिष्क वालों ने इसी विषय पर काम करना पसन्द किया पर इस शताब्दी के समाप्त होते होते ही, यह बदल गया। इक्कीसिवीं शताब्दी है जीव वैज्ञानिकों की, पर्यावरणविदियों की।

मैंने उच्च शिक्षा १९६० के दशक में ली – भौतिक शास्त्री बनने के सपने देखे। ईश्वर तो कुछ और ही चाहते थे – मैं फाइलें ईधर उधर पलटने वाला बन गया। विद्यार्थी जीवन में विज्ञान की अच्छी पत्रिका साईंटिफ्कि अमेरिकन (Scientific American) आया करती थी। मैं उसका नियमित ग्राहक था। विज्ञान विषय छोड़ते के बाद, मैंने विज्ञान से संबन्ध तो रखा पर इस पत्रिका को लेना बन्द कर दिया। इसे अमेरिका से मंगवाना पड़ता था – १९६० के दशक में न केवल यह मंहगा था पर मुश्किल भी।

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कुछ सालों से साईंटिफ्कि अमेरिकन पत्रिका अब भारत में निकलने लगी है। मैं इसके भारत में निकलने के समय से ही इसका नियमित ग्राहक हूं और इसमें निकलने वाले लेखों में अन्तर देखता हूं। अब काफी लेख जीव विज्ञान और पर्यावरण पर होते हैं।

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अपने देश में, इस समय दो अन्य पत्रिकायें पर्यावरण पर निकल रहीं हैं।

मैं इन दोनो पत्रिकाओं का भी नियमित ग्राहक हूं।

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यह तीनो अच्छी पत्रिकायें हैं। यदि आपको इन विषयों पर रुचि है तो इनके ग्राहक बने। यहां मैं इतना कहना चाहूंगा कि साईंटिफ्कि अमेरिकन के लिये विज्ञान का कुछ ज्ञान होना जरूरी है। डाउन टू अर्थ तथा टॅराग्रीन में भी इन विषयों का कुछ ज्ञान जरूरी है पर साईंटिफ्कि अमेरिकन के बराबर नहीं। डाउन टू अर्थ तथा टॅराग्रीन में, मुझे डाउन टू अर्थ ज्यादा पसन्द आती है।

पर्यावरण विषय तो हिन्दी चिट्ठाकारी से भी नहीं अछूता है। इस पर दो चिट्ठे भी हैं एक है पर्यावरण डाइजेस्ट, जो कि सन् १९८७ से निरंतर प्रकाशित, पर्यावरण पर पहली राष्ट्रीय हिन्दी मासिक है; दूसरा है पर्यानाद्। इन दोनो चिट्ठों के महत्व को नकारा नहीं जा सकता है। इन पर भी नज़र डालते चलिये।
हमें भूलना नहीं चाहिये,

यह पृथ्वी मां हमें अपने पूर्वजों से नहीं मिली है,
इसे हमने अपनी अगली पीढ़ी से उधार ले रखा है।

के बारे में उन्मुक्त
मैं हूं उन्मुक्त - हिन्दुस्तान के एक कोने से एक आम भारतीय। मैं हिन्दी मे तीन चिट्ठे लिखता हूं - उन्मुक्त, ' छुट-पुट', और ' लेख'। मैं एक पॉडकास्ट भी ' बकबक' नाम से करता हूं। मेरी पत्नी शुभा अध्यापिका है। वह भी एक चिट्ठा ' मुन्ने के बापू' के नाम से ब्लॉगर पर लिखती है। कुछ समय पहले,  १९ नवम्बर २००६ में, 'द टेलीग्राफ' समाचारपत्र में 'Hitchhiking through a non-English language blog galaxy' नाम से लेख छपा था। इसमें भारतीय भाषा के चिट्ठों का इतिहास, इसकी विविधता, और परिपक्वत्ता की चर्चा थी। इसमें कुछ सूचना हमारे में बारे में भी है, जिसमें कुछ त्रुटियां हैं। इसको ठीक करते हुऐ मेरी पत्नी शुभा ने एक चिट्ठी 'भारतीय भाषाओं के चिट्ठे जगत की सैर' नाम से प्रकाशित की है। इस चिट्ठी हमारे बारे में सारी सूचना है। इसमें यह भी स्पष्ट है कि हम क्यों अज्ञात रूप में चिट्टाकारी करते हैं और इन चिट्ठों का क्या उद्देश्य है। मेरा बेटा मुन्ना वा उसकी पत्नी परी, विदेश में विज्ञान पर शोद्ध करते हैं। मेरे तीनों चिट्ठों एवं पॉडकास्ट की सामग्री तथा मेरे द्वारा खींचे गये चित्र (दूसरी जगह से लिये गये चित्रों में लिंक दी है) क्रिएटिव कॉमनस् शून्य (Creative Commons-0 1.0) लाईसेन्स के अन्तर्गत है। इसमें लेखक कोई भी अधिकार अपने पास नहीं रखता है। अथार्त, मेरे तीनो चिट्ठों, पॉडकास्ट फीड एग्रेगेटर की सारी चिट्ठियां, कौपी-लेफ्टेड हैं या इसे कहने का बेहतर तरीका होगा कि वे कॉपीराइट के झंझट मुक्त हैं। आपको इनका किसी प्रकार से प्रयोग वा संशोधन करने की स्वतंत्रता है। मुझे प्रसन्नता होगी यदि आप ऐसा करते समय इसका श्रेय मुझे (यानि कि उन्मुक्त को), या फिर मेरी उस चिट्ठी/ पॉडकास्ट से लिंक दे दें। मुझसे समपर्क का पता यह है।

One Response to यह जीव विज्ञान और पर्यायवरण की शताब्दी है

  1. Cyril Gupta says:

    आप सही कह रहे हैं। पर्यावरण और ऊर्जा इस सदी की दो बड़ी मुश्किलें होने वालीं हैं। डाउन टू अर्थ और साइंटिफिक अमेरिकन मैं भी पढ़ता हूं। साथ ही साइंस रिपोर्टर भी पढ़ें, इसमें भी कुछ अच्छे लेख आते हैं।

    आजकल समयाभाव है, इसलिये ज्यादातर जानकारी इंटरनेट से इकट्ठा करता हूं।

    पर्यावरण/ऊर्जा के बारे में कभी-कभी मैं अपने अंग्रेजी ब्लाग पर लिखता हूं। आपको नीचे पर्यावरण पर कुछ अच्छे ब्लागों का लिंक दे रहा हूं, अगर आपके पास पहले से नहीं थे, तो अच्छे लगेंगे.

    http://ecofuss.com
    http://ecotality.com/
    http://www.lowtechmagazine.com/
    http://www.metaefficient.com/
    http://www.triplepundit.com/

    आपका यह लेख दुनिया भर की बहस और प्रतिबद्धता से बेहतर है। ब्लागों पर ऐसे मुद्दे भी और उठाये जाने चाहिये।

    गुप्त जी धन्यवाद – उन्मुक्त

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