कलाकार बनाम वैज्ञानिक

फ्रांसीसी अणुजीव वैज्ञानिक (microbiologist) एंटोनि डैंचिन (Antoine Danchin) ने अपनी पुस्तक ‘The Delphic Boat: What Genomes Tell Us’ में सवाल पूछा कि यदि निम्न चार में से, आप केवल तीन को ही बचा सकते होते तो किन तीन को बचायेंगे तथा किसे नष्ट होने देंते। यह चार हैं,

  1. Michelangelo’s Pieta;
  2. Shakespeare’s Hamlet;
  3. Mozart’s Don Giovanni;
  4. Einstein’s 1905 paper on relativity.

पहली यदि तीन कला की क्षेत्र में अद्वितीय हैं तो चौथी विज्ञान के क्षेत्र में।

डैंचिन के मुताबिक वे, बिना किसी हिचकिचाहट के, आईंस्टाईन के १९०५ के सापेक्षता सिद्धान्त को नष्ट हो जाने देते क्योंकि इसके न रहने से विज्ञान में कोई अन्तर न पड़ता। उनके अनुसार कुछ साल के अन्दर कोई और सापेक्षता का सिद्धान्त ढूढ़ लेता पर माईकेलएंजलो, शेक्सपियर, और मोज़ार्ट के न होने पर यह नहीं कहा जा सकता कि कोई दूसरा इस तरह की कलाकृतियां बना पाता अथवा नहीं। शायद, संसार न केवल इन कलाकृतियों के बिना ही रह जाता पर कला का क्षेत्र भी सूना रहता।

इस बात को समर्थन करते हुऐ यहां कुछ और भी कारण और उदाहरण दिये गये हैं। मसलन,

  • आईंस्टाईन १९०५ की सापेक्षता के सिद्धान्त कि पुष्टि हिरोशिमा और नगासाकी के परमाणु बम से हुई और यह इस सिद्धान्त पर काला दाग है जब कि माईकेलएंजलो, शेक्सपियर, और मोज़ार्ट की कलाकृतियों में इस तरह का कोई भी दाग नहीं है।
  • DNA की बनावट double helix की तरह है। इसका पता वाटसन और क्रिक ने लगाया। यदि वे इसे न ढूढते तो कोई और इसे ढूढ लेता।

यह सच है कि विज्ञान की हर खोज जिस वैज्ञानिक ने की, यदि वह न करता तो कोई न कोई और कर लेता पर कला के लिये यह नहीं कहा जा सकता है। फिर भी मुझे यह तुलना अच्छी नहीं लगी।

विज्ञान की कई खोजें यदि उस समय न होती जब वे हुई थीं तो उसके एक या दो साल के अन्दर हो जाती पर कई खोजे ऐसी भी हैं जो कि शायद कई साल तक न हो पाती। यदि हम आईंस्टाईन के १९१७ के general relativity के सिद्धान्त को ही देखें तो यदि आईंस्टाईन न होते तो शायद इसकी खोज अगले ५० साल तक न हो पाती। यह विज्ञान के क्षेत्र का नया आयाम है। यह बता पाना मुश्किल है कि विज्ञान के क्षेत्र में हुई देर का विज्ञान पर या उस सिद्धान्त पर आधारित दैनिक जीवन में उपयोगी वस्तुओं पर क्या असर होता। इसी तरह, यदि माईकेलएंजलो, या शेक्सपियर, या मोज़ार्ट न होते तो क्या संसार में कला न होती। मेरे विचार से कला तो होती, बस इसका स्वरूप दूसरा होता।

मेरे विचार में विज्ञान और कला के क्षेत्र अलग हैं, दोनो का महत्व अपनी, अपनी जगह है और यह अलग, अलग है। इन दोनो कि तुलना करना अनुचित है।

गणित का एक क्षेत्र है – catastrophe theory. यह इस तरह के अनिश्चित बातों का अध्यन करता है पर यह अभी तक इतना विकसित नहीं है। शायद भविष्य में, हम ज्यादा भरोसे के साथ अनुमान लगा सकें कि यदि माईकेलएंजलो, या शेक्सपियर, या मोज़ार्ट न होते तो कला का क्या स्वरूप होता। मैं प्रयत्न करूंगा कि catastrophe theory के बारे में कुछ लिखूं।

के बारे में उन्मुक्त
मैं हूं उन्मुक्त - हिन्दुस्तान के एक कोने से एक आम भारतीय। मैं हिन्दी मे तीन चिट्ठे लिखता हूं - उन्मुक्त, ' छुट-पुट', और ' लेख'। मैं एक पॉडकास्ट भी ' बकबक' नाम से करता हूं। मेरी पत्नी शुभा अध्यापिका है। वह भी एक चिट्ठा ' मुन्ने के बापू' के नाम से ब्लॉगर पर लिखती है। कुछ समय पहले,  १९ नवम्बर २००६ में, 'द टेलीग्राफ' समाचारपत्र में 'Hitchhiking through a non-English language blog galaxy' नाम से लेख छपा था। इसमें भारतीय भाषा के चिट्ठों का इतिहास, इसकी विविधता, और परिपक्वत्ता की चर्चा थी। इसमें कुछ सूचना हमारे में बारे में भी है, जिसमें कुछ त्रुटियां हैं। इसको ठीक करते हुऐ मेरी पत्नी शुभा ने एक चिट्ठी 'भारतीय भाषाओं के चिट्ठे जगत की सैर' नाम से प्रकाशित की है। इस चिट्ठी हमारे बारे में सारी सूचना है। इसमें यह भी स्पष्ट है कि हम क्यों अज्ञात रूप में चिट्टाकारी करते हैं और इन चिट्ठों का क्या उद्देश्य है। मेरा बेटा मुन्ना वा उसकी पत्नी परी, विदेश में विज्ञान पर शोद्ध करते हैं। मेरे तीनों चिट्ठों एवं पॉडकास्ट की सामग्री तथा मेरे द्वारा खींचे गये चित्र (दूसरी जगह से लिये गये चित्रों में लिंक दी है) क्रिएटिव कॉमनस् शून्य (Creative Commons-0 1.0) लाईसेन्स के अन्तर्गत है। इसमें लेखक कोई भी अधिकार अपने पास नहीं रखता है। अथार्त, मेरे तीनो चिट्ठों, पॉडकास्ट फीड एग्रेगेटर की सारी चिट्ठियां, कौपी-लेफ्टेड हैं या इसे कहने का बेहतर तरीका होगा कि वे कॉपीराइट के झंझट मुक्त हैं। आपको इनका किसी प्रकार से प्रयोग वा संशोधन करने की स्वतंत्रता है। मुझे प्रसन्नता होगी यदि आप ऐसा करते समय इसका श्रेय मुझे (यानि कि उन्मुक्त को), या फिर मेरी उस चिट्ठी/ पॉडकास्ट से लिंक दे दें। मुझसे समपर्क का पता यह है।

8 Responses to कलाकार बनाम वैज्ञानिक

  1. माईकेलएंजलो, या शेक्सपियर, या मोज़ार्ट न होते तो दुनियाँ का कौनसा बड़ा नुकसान हो जाता पर वैज्ञा्निकों के ना होने से जरूर होता। हाँ सही है कि सिद्धान्त को कई और खोज लेता पर देर तो होती ना! उस नुकसान की तुलना कला से करना गलत है।

  2. Shrish says:

    मैं एंटोनि डैंचिन महोदय से कतई सहमत नहीं। मैंने उपरोक्त तीनों कलाकृतियाँ नहीं देखी/पढ़ी/सुनी, मेरी तरह कई और लोग भी शायद जिंदगी भर इन्हें न जान सकें। लेकिन हमारा जीवन इन कलाकृतियों के बगैर किसी भी तरह अपूर्ण नहीं। ये हमें किसी तरह फायदा नहीं पहुँचाती सिवाय कुछ पलों का आनन्द देने के।

    लेकिन विज्ञान की कुछ खोजें जैसे कि ‘सापेक्षता सिद्धांत’ इस शताब्दी की महान तथा अद्वितीय खोजें थी। जिन्होंने विज्ञान न पढ़ा हो वे ऐसी बात करते तो ठीक पर खुद वैज्ञानिक महोदय ऐसा कह रहे हैं यह खेदजनक है। विज्ञान के छात्र जानते हैं कि विज्ञान का विकास ही क्रमबद्ध रुप से एक खोज से दूसरी खोज द्वारा होता है। एक थ्योरी, एक ऐक्सपेरिमेंट से दूसरे का विकास होता है। यदि मैं कहूँ कि सिर्फ दो आदमी न्यूटन और आइन्सटीन न हुए होते तो मानव सभ्यता में विज्ञान का वो स्थान न होता जो आज है। रही बात परमाणु बम वाली तो आइन्स्टीन ने उपरोक्त सिद्धांत की खोज बम बनाने के लिए नहीं की थी। कुआँ पानी पीने के लिए खोदा जाता है यदि कोई भूलवश उसमें गिर जाए तो इसमें बनाने वाले का दोष नहीं।

    आम आदमी विज्ञान न भी पढ़े तो भी विज्ञान उसे लाभ पहुँचाता है। परन्तु इन कलाकृतियों से आम आदमी को कोई लाभ नहीं, वो तो इनका सार भी नहीं समझ सकता। बल्कि मैं कहता हूँ कि यदि उपरोक्त तीनों कलाकृतियाँ आज से १००० साल भी कोई और रचता तो आफत न आ जाती।🙂

    अन्त में यह न समझा जाए कि मैं इन कलाकृतियों का अवमूल्यन कर रहा हूँ लेकिन इन वैज्ञानिक महोदय की जगह मैं ‘सापेक्षता सिद्धांत’ को चुनता।😛

  3. प्रेमलता says:

    विज्ञान मस्तिष्क है तो कला हृदय। विज्ञान में भी कला छिपी है तो कला का भी विज्ञान होता है, किसी को भी नष्ट करने पर
    नुकसान समान प्रतीत होगा।

  4. Divyabh says:

    उन्मुक्त जी, कला किसी की घरवाली नहीं जो
    माइकल,गाव आदि कलाकारों के नही होने से
    अपने को और… मोड़ देती है,कला पहले कलाकार
    की आँखों में पहुँचकर उसे योजनों का दृष्टिकोण
    प्रदान करती है,भावना तो उस कला में होती है जो
    कलाकार की रेखाओं को शब्द देती हैं…सर, Science
    तो शाप भी है और वरदान आइंस्टिन न होते तो
    भी कोई न कोई उनकी राह को खोज ही लेता…..,
    क्यों…?क्योंकि Science एक स्तरीकृत knowledge है,
    एक नही तो दुसरा पीछे से वहाँ पहुँच ही जाता है..
    कला में भी यह है मसलन संगीत का घराना…।that’s
    why u r in sme extent right….!!!

  5. मैं प्रेमलता जी की बात से पूर्णतः सहमत हूँ.

  6. ह्म्म …..

    मै भी शायद आईन्सटाईन का समर्थन नही करता ! आईन्स्टाईन एक महान वैज्ञानिक थे !
    इसमे कोई शक नही है लेकिन सापेक्षतावाद का सिद्धांत शायद पूरी तरह से सही नही है।
    यह सिद्धांत श्याम उर्जा और श्याम पदार्थ को समझा नही पा रहा है ! कहीं ऐसा तो नही कि इस सिद्धांत की वजह से आज का विज्ञान गलत दिशा की ओर जा रहा है ?
    मेरे कहने का मतलब यह है कि इस सिद्धांत ने कही हमे दिशा भ्रमित तो नही किया !

    वैसे मै कलाकार और वैज्ञानिको की तुलना नही करना चाहता ! एक वैज्ञानिक के अंदर भी एक कलाकार छुपा होता है🙂

  7. rachana says:

    मै आपकी इस बात से सहमत हूँ.
    //मेरे विचार में विज्ञान और कला के क्षेत्र अलग हैं, दोनो का महत्व अपनी, अपनी जगह है और यह अलग, अलग है। इन दोनो कि तुलना करना अनुचित है.//

  8. maggie says:

    this is very nice .

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