जीना ऽ…ऽ यहां मुश्किल

जीना ऽ…ऽ यहां मुश्किल,
जरा हट के,जरा बच के
यह बाम्बे (ब्लॉगिंग) है,मेरी जान।

 

क्या आप चिट्ठा लिखते हैं? बच कर लिखियेगा, कहीं नौकरी से न हाथ खो बैठें, जैसे कैथरीन खो बैठीं। उनके मुताबिक उन्हें इस लिये निकाल दिया गया क्योंकि वे ऑफिस के बारे में अपने चिट्ठे में लिखती थीं। वे अकेली नहीं हैं ऐसे बहुत सारे लोग हैं

ऐसा क्या करना चाहिये कि नौकरी से हाथ खोना पड़े? कानूनी विशेष्ज्ञों के मुताबिक यह बताना मुश्किल है, पर कुछ मोटी बातें यह हैं कि,

  • निन्दा (Defamation) करने से बचो;
  • कॉपीराइट का उलंघन न करो;
  • ट्रेड सीक्रेट न बताओ।

यदि आप मेरे जैसे कानून न जानने वालों की सलाह जानना चाहते हों तो वह है कि आप पर हुक्म चलाने वाला (चाहे वह आपकी पत्नी हो या बौस) हमेशा सही है।

यदि आप यह विस्तार से जानना चाहें कि,

  • कैथरीन के क्या किया था; या
  • उसके साथ क्या हुआ; या
  • उसने क्या किया,

तो इसे यहां पढ़ सकते हैं। यदि आप चिट्ठा लिखने वालों के अधिकार को जानना चाहें तो यहां पढ़ सकते हैं।

के बारे में उन्मुक्त
मैं हूं उन्मुक्त - हिन्दुस्तान के एक कोने से एक आम भारतीय। मैं हिन्दी मे तीन चिट्ठे लिखता हूं - उन्मुक्त, ' छुट-पुट', और ' लेख'। मैं एक पॉडकास्ट भी ' बकबक' नाम से करता हूं। मेरी पत्नी शुभा अध्यापिका है। वह भी एक चिट्ठा ' मुन्ने के बापू' के नाम से ब्लॉगर पर लिखती है। कुछ समय पहले,  १९ नवम्बर २००६ में, 'द टेलीग्राफ' समाचारपत्र में 'Hitchhiking through a non-English language blog galaxy' नाम से लेख छपा था। इसमें भारतीय भाषा के चिट्ठों का इतिहास, इसकी विविधता, और परिपक्वत्ता की चर्चा थी। इसमें कुछ सूचना हमारे में बारे में भी है, जिसमें कुछ त्रुटियां हैं। इसको ठीक करते हुऐ मेरी पत्नी शुभा ने एक चिट्ठी 'भारतीय भाषाओं के चिट्ठे जगत की सैर' नाम से प्रकाशित की है। इस चिट्ठी हमारे बारे में सारी सूचना है। इसमें यह भी स्पष्ट है कि हम क्यों अज्ञात रूप में चिट्टाकारी करते हैं और इन चिट्ठों का क्या उद्देश्य है। मेरा बेटा मुन्ना वा उसकी पत्नी परी, विदेश में विज्ञान पर शोद्ध करते हैं। मेरे तीनों चिट्ठों एवं पॉडकास्ट की सामग्री तथा मेरे द्वारा खींचे गये चित्र (दूसरी जगह से लिये गये चित्रों में लिंक दी है) क्रिएटिव कॉमनस् शून्य (Creative Commons-0 1.0) लाईसेन्स के अन्तर्गत है। इसमें लेखक कोई भी अधिकार अपने पास नहीं रखता है। अथार्त, मेरे तीनो चिट्ठों, पॉडकास्ट फीड एग्रेगेटर की सारी चिट्ठियां, कौपी-लेफ्टेड हैं या इसे कहने का बेहतर तरीका होगा कि वे कॉपीराइट के झंझट मुक्त हैं। आपको इनका किसी प्रकार से प्रयोग वा संशोधन करने की स्वतंत्रता है। मुझे प्रसन्नता होगी यदि आप ऐसा करते समय इसका श्रेय मुझे (यानि कि उन्मुक्त को), या फिर मेरी उस चिट्ठी/ पॉडकास्ट से लिंक दे दें। मुझसे समपर्क का पता यह है।

6 Responses to जीना ऽ…ऽ यहां मुश्किल

  1. Punit Pandey says:

    mere jaise bahut sare log bhi hain jinko chitthon ki vajaha se naukri mili hai😉 bindaas likho.

  2. “चतुर्थ अनुच्छेद, प्रथम वाक्य”

    बात कुछ हजम नही हुई😛

  3. आपकी लिखी विषय-वस्तु से किसी व्यक्ति, संस्था आदी का नुकसान हो, तो उससे बचना भी चाहिए या सजा पाने के लिए तैयार भी रहना चाहिए.

  4. bhuvnesh says:

    मैं तो घर पर बैठकर लिखता हूं

  5. फ़िलहाल तो डरने की कोई बात नहीं क्यों कि अपन खुद ही मालिक और खुद ही कर्मचारी है।

  6. SHUAIB says:

    ऐसे किस्से बहुत बार पढ-सुन चुका हूं। पता नही क्यों अकसर ऐसे हाद्से सिर्फ अमेरिका ही मे होते हैं। मेरा ये मानना है कि चिट्ठा लिखने से अगर नौकरी जाती है तो नई नौकरी भी मिलती है🙂

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