कौन कहते हैं कि भगवान आते नहीं

क्या कभी आपका मन अशान्त होता है, या मन में अस्थिरिता रहती है, या भविष्य के बारे में अनिश्चित्ता लगती है?

मेरे साथ ऐसा होता है, अक्सर तो नहीं पर कभी कभी।

कुछ लोग ऐसे समय में ज्योतिषों के पास चले जाते हैं तो कुछ पंडितों के पास। कुछ पूजा पाठ में लीन हो जाते हैं तो फिर कुछ स्वामियों, योगियों, साध्वियों की शरण में चले जाते हैं। कुछ नेताओं के शरण में :-)

मैं न तो ज्योतिष, न ही हस्त रेखा या अंक विद्या पर विश्वास करता हूं। मैं मन्दिर जाता हूं – उसकी बनावट या इतिहास जानने के लिये, पर भगवान के दर्शन के लिये नहीं। मैं भगवान पर भी विश्वास नहीं करता – अज्ञेयवादी हूं।

कुछ समय पहले मुझे पुरी जगन्नाथ जी के मन्दिर जाने का मौका मिला। मैंने उसके इतिहास के बारे में जाना, वहां शाम को झन्डे बदलने के कार्यक्रम को देखा पर मन्दिर के अन्दर दर्शन करने नहीं गया। वहां के मुख्य पुजारी, जो पूरे समय मेरे साथ रहे, उसने कई बार मुझसे खास पूजा के लिये कहा पर मेरे मना कर देन पर उसे यह समझ में नहीं आया कि मैं वहां फिर क्या करने गया था। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कोई केवल इसके इतिहास को जानने के लिये मन्दिर में आयेगा।

इस सब के बावजूद भी,  जब मेरा मन अशान्त होता है या अनिश्चित्ता होती तो मैं रमायण सुनता हूं या फिर कोई भजन। मैं समझ नहीं पाता कि ऐसा क्यों होता है। दिल को तर्क से नहीं समझा जा सकता है।

‘कौन कहते हैं कि भगवान आते नहीं’ भी ऐसा ही भजन है। इसको सुनने से जो शान्ति मिलती है वह शायद लिखी नहीं जा सकती है, केवल अनुभव की जा सकती है। आप स्वयं सुन कर देखिये।

यदि आप इस भजन के बोल जानना चाहते हैं तो फिर यू-ट्यूब जा कर more info के बटन पर चटका लगा कर पढ़ सकते हैं।

आज का दिन कुछ … अलविदा  … फिर … मिलेंगे।

उफ, क्या मैं कभी चैन से सो सकूंगी

यह चिट्ठी एक महिला वकील के बचपन के अनुभवों का जिक्र करती हुई, यौन शिक्षा पर जोर देती है।

‘काश मैं एक रात भी, उन हाथों को सपनो में देखे बिना सो सकती’,

यह कहना है चेन्नाई की एक २४ वर्षीय सफल महिला वकील का।

वे किसके हाथ हैं, वे  सपनो क्यों न आयें, क्या हाथ भी सपनो में किसी को तंग कर सकते हैं?

क्या आप समझ नहीं पाये वे किसके हाथ हैं और वह वकील महिला उनसे क्यों डरती है?

वे हाथ हैं उसके बड़े भाई के, वे हाथ हैं उसके पड़ोसी के।

वे हाथ हैं उसके बड़े भाई के, वे हाथ हैं उसके पड़ोसी के, जिसके यहां वह बचपन में,  अपनी हम उम्र सहेली के यहां लुका छिपी खेलने जाया करती थी।

क्या आप अब भी नहीं समझ नहीं पाये कि वह वकील महिला उनसे क्यों डरती है?

मैं तहलका (Tehlka) पत्रिका का नियमित ग्राहक हूं। हमारे पास इसका अंग्रेजी भाषा का संस्करण आता है। इसमें एक स्तंभ है व्यक्तिगत इतिहास (Personal History) का। १३ सितम्बर के अंक के इस कॉलम के अन्तर्गत इसी महिला  ने इस बारे में

‘I pray that some day I will sleep without seeing those hands in my dreams’

नाम के शीर्षक से लिखे हैं आप इस अंक के लेख को पढ़ें या अन्तरजाल में यहां पढ़ें।

वे मुझेउस जगह छू रहे थे जहांं उन्हें नहीं छूना चाहिये था। वे मुझसे वह करवा रहे थे जो मुझे नहीं करना चाहिये था।


आपको क्या लगता है कि यह महिला झूट बोल रही है?

मुन्ने की मां के अनुसार जो भी इसके साथ हुआ वह अक्सर होता है। यह काम परिवार के लोग या फिर जान पहचान के लोग ही करते हैं।

यह महिला अपने अनुभव में कुछ हद तक अपने को भी को दोषी मानती है।  आपको क्या लगता है क्या वह दोषी है?

लड़की छोटी थी पर उसका भाई बड़ा था। उसका पड़ोसी भी उम्र में बड़ा था। क्या गलती उन दोनो की नहीं है? उन्होंने ऐसा क्यों किया? क्या उन्हें यह सब नहीं समझना चाहिये था? क्या गलती उनके माता पिता की, यह उस समाज की नहीं है जिसने,

  • न तो बड़े भाई को न उस पड़ोसी को उचित यौन शिक्षा दी
  • न ही उस महिला बच्ची को इस मुसीबत से बचाया।

मेरे विचार में शायद उन्हें  ठीक प्रकार से शिक्षा नहीं मिली। उन्हें यह ठीक प्रकार से मिली होती तो वे समझ पाते कि ६ साल की बच्ची पर उनकी हरकतों का क्या असर पड़ेगा।

आपको क्या लगता है कि क्या यौन शिक्षा नहीं होनी चाहिये?

मेरे विचार से यौन शिक्षा होनी चाहिये। मैं इसका पक्षधर हूं। अक्सर लोग इसका विरोध इसलिये करते हैं क्योंकि वे इसका अर्थ गलत समझते हैं। वे समझते हैं कि इसका सम्बन्ध केवल सम्भोग  या फिर प्रजनन से है। यह सोच ठीक नहीं है। यौन शिक्षा का अर्थ कुछ और है।  इस तरह की बातें परिवार समाज में होती हैं। मैंने पिछले साल लिखा था कि,

  • मेरी मां ने किस प्रकार से मुझे किस तरह से इससे दूर रखा
  • किस तरह से इस सच्चाई से अवगत कराया,
  • मुझे किस तरह यौन शिक्षा मिली, और
  • मैंने अपनी अगली पीढ़ी को इसके बारे में बताया।

मेरे विचार में यौन शिक्षा जरूरी है और यह किस तरह से हो उसके बारे में विचार जरूरी है।

क्या वह लड़की कभी ठीक से सो सकेगी? आशा करता हूं कि उसका वैवाहिक जीवन सुखी रहेगा।

तहलका में लिखे लेख को पढ़ने के लिये इस चित्र पर चटका लगायें।

इस चिट्ठी पर सारे चित्र तहलका के सौजन्य से हैं।

यौन शिक्षा क्या है और वह क्यों जरूरी है – कुछ लेख

यौन शिक्षा।। यहां सेक्स पर बात करना वर्जित है: हमने जानी है जमाने में रमती खुशबू।। यौन शिक्षा जरूरी है।। Trans-gendered – सेक्स परिवर्तित पुरुष या स्त्री।। मैं लड़के के शरीर में कैद थी।। मां को दिल की बात कैसे बतायें।।  क्या, अंतरजाल तकनीक पर काम करने वालों पर, वाई क्रोमोसोम हावी है?।।

हिन्दी में नवीनतम पॉडकास्ट Latest podcast in Hindi

(सुनने के लिये चिन्ह शीर्षक के बाद लगे चिन्ह ► पर चटका लगायें यह आपको इस फाइल के पेज पर ले जायगा। उसके बाद जहां Download और उसके बाद फाइल का नाम अंग्रेजी में लिखा है वहां चटका लगायें।: Click on the symbol ► after the heading. This will take you to the page where file is. Click where ‘Download’ and there after name of the file is written.)

  • नानी पालकीवाला – एक जीवनी
  • वह तारा 

यह ऑडियो फइलें ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप -

  • Windows पर कम से कम Audacity, MPlayer, VLC media player, एवं Winamp में;
  • Mac-OX पर कम से कम Audacity, Mplayer एवं VLC में; और
  • Linux पर सभी प्रोग्रामो में – सुन सकते हैं।

बताये गये चिन्ह पर चटका लगायें या फिर डाउनलोड कर ऊपर बताये प्रोग्राम में सुने या इन प्रोग्रामों मे से किसी एक को अपने कंप्यूटर में डिफॉल्ट में कर लें।

सांकेतिक शब्द

culture, life, Sex education, जीवन शैली, समाज, कैसे जियें, जीवन दर्शन, जी भर कर जियो, दर्शन, यौन शिक्षा,

कभी प्यासे को पानी पिलाया नहीं

आज सुबह अन्तरजाल में विचरण करते समय मुझे यह भजन सुनने को मिला – दिल को छू गया, कई बार सुना।

आप भगवान पर विश्वास करते हों या नहीं। आप हिन्दू हों या मुसलमान, ईसाई हों या फिर किसी और धर्म के अनुयायी – यह भजन आपको पसन्द आयेगा।

यह भजन दिल के उन तारों को छूता है जो शायद कोई और नहीं।

इस भजन को सुनते समय मुझे पुरानी चिट्ठियों की याद आयी – याद आयी अनुगूंज १८ की।

संजय जी ने, अनुगूंज १८ ‘मेरे जीवन में धर्म का महत्व‘ नाम से आयोजित की थी। मैंने इसके लिये एक चिट्ठी इसी नाम से पोस्ट की थी। दो साल पहले रचना जी के द्वारा टैग किये जाने पर पांच सवालों का जवाब ‘एक अनमोल तोहफ़ा‘ चिट्ठी में दिया था। उस समय, अपनी लिखी चिट्ठियों में मुझे अनुगूंज १८ के लिये लिखी गयी यही चिट्ठी सबसे अच्छी लगी थी। अपनी लिखी चिट्ठियों में, मुझे यह चिट्ठी,  आज भी सबसे अच्छी लगती है। शक नहीं, यह चिट्ठी मेरी लिखी चिट्ठियों में हमेशा सबसे अच्छी चिट्ठी रहेगी, क्योंकि यह मेरे दिल के सबसे पास है।

इस भजन का संगीत हमराज़ फिल्म के इस गाने की धुन पर है – इसे भी सुनिये।

यह भी कर्णप्रिय है

मैं इस चिट्ठी से एक बात और भी कहना चाहता हूं। चिट्ठे पर लिखिये वही – जो आपके दिल को छूता हो, जो आपके दिल के सबसे पास हो। क्योंकि वह आपकी सबसे अच्छी अभिव्यक्ति है।

मैं लड़के के शरीर में कैद थी

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‘मैं ग़ज़ल हूं। मैं २४ साल पुरुष शरीर के अन्दर, कैद रही :-( शल्यचिकित्सा से आज़ाद हुई। बहुत समय निकल गया, बहुत कुछ रह गया, छूट गया, बहुत कुछ पाना है – कपड़े, चूड़ियां, बालियां, मेकअप पर मैंने जीवन की सबसे महत्वपूर्ण चीज़ पा ली – जो अक्सर लोगों से छूट जाती है – ज़िंदगी :-)

लिङ्ग डिज़िटल नहीं होता इसे आप दो भाग में नहीं बांट सकते हैं। इसके कुछ रूप और भी हैं। मैंने कुछ समय पहले अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर ‘Trans-gendered – सेक्स परिवर्तित पुरुष या स्त्री‘ नामक चिट्ठी में उन लोगों की चर्चा की थी जिन्हें प्रकृति अलग तरह से बनाती है – मस्तिष्क, लिङ्ग का देती है और शरीर, दूसरे लिङ्ग का। इस चिट्ठी में मैंने इन लोगों की परेशानियों के बारे में लिखा था और एक टीवी कंपनी के ओछे विज्ञापन का जिक्र किया था, जिसके खिलाफ कुछ लिखा पढ़ी की। हमारा समाज ऐसे लोगों की पीड़ा समझना तो दूर, इनका मजाक बनाने मे भी पीछे नहीं रहता। मैंने इसी तरह के विचार शास्त्री जी इस चिट्ठी पर भी दिये थे।

ग़ज़ल चंडीगढ़ में, गुनराज़ नाम का लड़का थीं। लड़के के रूप में, इंजीनियर बनी। पिछले साल, शल्यचिकित्सा के द्वारा स्वतंत्र की गयीं। उन्होने अपनी यह भावनात्मक यात्रा, बेहतरीन तरीके से ‘द वीक‘ पत्रिका ने ९ मार्च के अंक पर लिखी है। यदि आपने यह नही पढ़ी हो तो यहां जा कर अवश्य पढ़ें। इस चिट्ठी में प्रकाशित ग़ज़ल के चित्रों को श्री संजय अहलवात ने खींचा है। यह तीनों चित्र ‘द वीक’ के उसी लेख से, उसी पत्रिका के सौजन्य से हैं।

‘उन्मुक्त जी, तीन चित्र? यहां तो एक ही है’

जी हां, मैंने तीन चित्रों को जोड़ कर एक किया। उसके बाद उसका आकार और पिक्सल कम करके यहां प्रकाशित किया है। यह सारा काम मैंने जिम्प (GIMP) प्रोग्राम से किया है। यह न केवल मुफ्त है पर मुक्त भी। यह सारे ऑपरेटिंग सिस्टम में चलता है और बेहतरीन प्रोग्राम है। जी हां, यह विंडोज़ पर भी चलता है। यह हमारी सारी जरूरतों को पूरा करता है। यदि यह आपके पास यह है तो आपको फोटोशॉप खरीदने की या फिर … करने की कोई जरूरत नहीं। आप एक बार स्वयं ,इस पर काम करके क्यों नहीं देखते।

‘उन्मुक्त जी, एक बात समझ में नहीं आयी?’

अरे, शर्माना कैसा, तुरन्त पूछिये।

‘आप घूम फिर कर ओपेन सोर्स पर क्यों पहुंच जाते हैं?’

सांकेतिक शब्द

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यौन शिक्षा जरूरी है

मैं समलैंगिक रिश्तों का हिमायती नहीं हूं पर ऐसे लोगो को हेय दृष्टि से देखना, या उनके साथ भेदभाव करना, गलत समझता हूं।

कुछ व्यक्ति, दो लिंगों के बीच फंस (intersex) जाते हैं। मैं ऐसे लोगों का मजाक बनाना गलत समझता हूं। मेरे विचार से लिंग डिज़िटल नहीं होता। इसे दो भागों में नहीं बांटा जा सकता हैं। इसके कुछ और रूप भी हैं। जो हर युग में, हर जगह, हर सभ्यता में पाये जाते हैं। मेरे विचार से ईश्वर – शायद प्रकृति कहना उचित होगा – इन्हें इसी तरह से बनाया है। इन्हे हास्य का पात्र बनाना अनुचित है। हमें इन्हें ऐसे ही स्वीकर करना चाहिये।

इस सब के साथ, मैं यौन शिक्षा का भी हिमायती हूं। मेरे विचार से, इसकी प्ररंभिक शिक्षा घर में ही होनी चाहिये। यह आजकल खास तौर से जरूरी है जब अंतरजाल में सब तरह की ब्लू फिल्म देखने को आसानी से मिल जाती है। टीवी के प्रोग्राम भी कुछ कम नहीं हैं।

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यही कारण है कि मैंने अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर चार चिट्ठियां ‘Trans-gendered – सेक्स परिवर्तित पुरुष या स्त्री‘, ‘यहां सेक्स पर बात करना वर्जित है‘, ‘यौन शिक्षा‘,’ यौन शिक्षा और सांख्यिकी‘, नाम से लिखीं। छुट-पुट चिट्ठे पर भी तीन चिट्ठियां ‘चार बराबर पांच, पांच बराबर चार, चार…‘, ‘आईने, आईने, यह तो बता – दुनिया मे सबसे सुन्दर कौन‘, ‘मां को दिल की बात कैसे बतायें‘ लिखीं। हां, ‘मां को को दिल की बात पता चली‘।
इन चिट्ठियों का संदर्भ कुछ अलग, अलग है। इसलिये यह यौन शिक्षा, जैसा हम समझते हैं, वैसी नहीं हैं पर इनमें यौन शिक्षा का महत्व या भ्रांतियों को अलग, अलग तरह से बताने का प्रयत्न किया है।

यौन शिक्षा‘ की चिट्ठी पर मैं एक कविता पर दुख, आक्रोश प्रगट कर, यह कहने का प्रयत्न कर रहा था कि बच्चों को ही नहीं, पर बड़ो को भी यौन शिक्षा की जरूरत है और महिला या बालिका शोषण का हल, बालक शोषण नहीं है। बालक भी, उतने ही यौन शोषण के शिकार होते हैं जितना कि बालिकायें या फिर महिलायें – शायद उनसे ज्यादा। आज के दैनिक जागरण की यह खबर कुछ इस तरफ इशारा करती है।

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सांकेतिक शब्द

culture, life, जीवन शैली, समाज, कैसे जियें, जीवन दर्शन, जी भर कर जियो,

अंतरजाल पर हिन्दी कैसे बढ़े

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काश
बालों में उलझती, खुद को उलझाती
तेरे चेहरे पे सरसराती
मेरी उंगलिया होठों पर रुक जातीं
कान मॆ धीमे से गुनगुनातीं

kaash.jpg

अधखुली अधजगी आखॊ में
अनगिनत सपने लिए
तेरे बदन की खुशबू को
अपनी रूह में बसाती

कुछ सिमट-सिकुड कर
तेरी बाहॊ में टूट जाती
काश ऐसा हो पाता
तू मेरा और मैं तेरी हो पाती

मैं अच्छा शीर्षक का झांसा दे कर, कविता नहीं पढ़वाना चाहता हूं। मैंने यह कविता नहीं लिखी है और न ही यह चित्र मेरे द्वारा खींचा गया है। कविता लिख पाना मेरे बस का नहीं है और न ही इतना सुन्दर चित्र खींच पाना। यह कविता और चित्र तो मैंने One from Cuckoo’s Nest नाम के चिट्ठे की इस चिट्ठी से चुराया है। वहां ये creative commons 2.5 के अन्दर प्रकाशित किया है (यह चिट्ठा और यह चिट्ठी इस समय अपने नये पते, यहां और यहां है)। इसलिये यह कविता और चित्र यहां भी इसी लाइसेन्स के अन्दर है। और बाकी सारा माल, नीचे के कार्टून को छोड़ कर, मेरी शर्तों के अन्दर प्रकाशित है।

कल इस चिट्ठे का जन्मदिन था। केक खाने को तो नहीं मिला पर उन्हें यह चिट्ठी, हिन्दी चिट्टा जगत की तरफ से भेंट है।

पर उन्मुक्त जी, यह चिट्ठा जिससे आपने यह कविता ली है वह तो किसी हिन्दी फीड एग्रेगेटर पर नहीं आता है फिर आपको कैसे मिला?

बताता हूं और मुद्दे पर भी आता हूं।

मैंने हिन्दी चिट्ठाकारिता, मोक्ष और कैफे हिन्दी की चिट्ठी लिखते समय तीन हिन्दी फीड एक्रेगेटर के बारे में बात की थी। उसके बाद तो जिसे देखो वही फीड एग्रेगेटर बना रहा है। लोग तो कह रहें हैं कि हिन्दी फीड एग्रेगेटर ज्यादा हो रहे हैं चिट्ठे कम :-)

aggregator-blog.png

यह कार्टून मजेदार समाचार चिट्ठे की इस चिट्ठी से लिया गया है।

खैर, इससे मुझे क्या लेना देना। मैंने भी एक अपना फीड एग्रेगेटर बना दिया – ‘देवनागरी चिट्ठे‘। (किसी कारणवश इस चिट्टी के पोस्ट हो जाने के बाद, उपर वाले फीड एग्रेगेटर को छोड़ कर दूसरा फीड एग्रेगेटर उन्मुक्त – हिन्दी चिट्ठों और पॉडकास्ट में नयी प्रविष्टियां नाम से बनाना पड़ा। इसमें वह सब खासियत हैं जो कि पुराने में थी और उससे बेहतर है।)

मेरा फीड एग्रेगेटर बहुत अच्छा है। यह सबकी चिट्ठियों की खबर रखता है, किसी के साथ भेदभाव नहीं है। इसको चलाने में एक भी धेला खर्चा नहीं होता है, न कोई समय लगता है – यह सारे काम अपने आप करता है। इसमें आप किसी भी भाषा में लिखते हों यदि देवनागरी लिपि में लिखेंगे तो यहां आ जायगा। इसको बनाने में कोई तकनीकी ज्ञान नहीं चाहिये।

हो गये न प्रभावित मुझसे :-)

खैर यह तो मैं आपको बिलकुल नहीं बताउंगा कि मैंने यह विचार कहां से कॉपी किया है या किसने मुझे इसकी टिप्स दी हैं। यदि बता दूंगा तो आप मुझे छोड़ कर, उसी की तारीफ करने लगोगे :-)

अपने इसी फीड एग्रेगेटर पर देखते समय, मैं इस चिट्टे पर पहुंच गया। यह चिट्ठा मुलतः अंग्रेजी में है जिसमें कुछ चिट्ठियां हिन्दी में हैं। यह कविता और चित्र अच्छे लगे, तुरन्त कॉपी कर, अपने चिट्ठे में लगाये।

लगता है कि आप गुस्सा कर रहें हैं शांत हो जांय, मैं तुरन्त शीर्षक की बात करता हूं।

एक बार, अनूप जी ने मेरा परिचय देते समय कहा कि, मैं बहुत कम टिप्पणी करता हूं। यह कुछ हद तक सही है। टिप्पणी न कर पाने का कारण भी मैंने आभार, धन्यवाद, बधाई नाम की चिट्ठी में स्पष्ट किया है।

मैं अक्सर ऐसे चिट्ठों पर अवश्य जाता हूं जो किसी भी नियमित हिन्दी फीड एग्रेगेटर पर नहीं आते हैं और जितनी टिप्पणियां मैं नियमित हिन्दी फीड एग्रेगेटर के चिट्ठों पर करता हूं उससे कहीं अधिक, ऐसे चिट्ठों पर करता हूं जो किसी भी नियमित हिन्दी फीड एग्रेगेटर में नहीं आते हैं। यह चिट्ठे अक्सर अंग्रेजी में होते हैं जिसमें हिन्दी की कुछ चिट्ठियां होती हैं या फिर हिन्दी के एकदम नये चिट्ठे। इनमें से कई वापस मेरे चिट्ठे पर आते हैं, इमेल करते हैं, और कईयों ने हिन्दी में लिखना शुरु कर दिया – कुछ नियमित हिन्दी फीड एग्रेगेटरों से जुड़ भी गये।

यदि हम सब भी कुछ ऐसे चिट्टों पर जा कर टिप्पणी करें तो जरूर ऐसे लोगों का उत्साहवर्धन होगा। यह लोग हिन्दी में और लिखेंगे। अन्तरजाल पर हिन्दी बढ़ेगी। ऐसे अनुनाद जी ने यहां बहुत अच्छे उपाय बतायें हैं यदि पढ़ने से रह गये हों तो अवश्य पढ़ें और हो सके तो अमल भी करें।

काश,
वे हिन्दी में और भी लिखती,
हम सब को सुनवाती,
हिन्दी चिट्ठाजगत पर सरसराती
काश ऐसा हो पाता
कि वे हिन्दी की और हिन्दीजगत उनका हो पाता।

यह बताना तो भूल ही गया कि इन चिट्ठियों पर टिप्पणी करते समय मुझे अक्सर उनसे भी मुलाकात होती है। वे वहां पर पहले से ही टिप्पणी करे बैठे होते हैं।

कौन हैं वे शख्स, जरा हमें तो भी बताइये।

अरे वही, जिनकी चिट्ठी से मैंने यह आइडिया चुराया है। नाम तो नहीं बताउंगा, बवाल शुरू हो जायगा।

हां मेरे हिन्दी फीड एक्रेगेटर पर जा कर एक नजर डाल दीजयेगा :-)

किसी कारणवश इस चिट्टी के पोस्ट हो जाने के बाद, उपर वाले फीड एग्रेगेटर को छोड़ कर दूसरा फीड एग्रेगेटर उन्मुक्त – हिन्दी चिट्ठों और पॉडकास्ट में नयी प्रविष्टियां नाम से बनाना पड़ा। इसे ही देखिये :-)

मेरा यह सब लिखने का कुछ और मकसद भी हैः

  • इस समय बहुत से हिन्दी फीड एक्रेगेटर हैं। सब अच्छे हैं और एक छोटे स्तर का हिन्दी फीड एक्रेगेटर (जैसा कि मेरा है) बनाना बहुत आसान है। यदि किसी कारण किसी एक्रेगेटर ने आपकी फीड हटा दी है या आपकी किसी चिट्ठी पोस्ट होने में कुछ देर हो गयी (जो कि केवल तकनीक के कारण से होती है) तो इस पर विवाद करने की या फिर सबको ईमेल कर, समय बर्बाद करने से अच्छा है कि, बढ़िया सी चिट्ठी पोस्ट की।
  • मैंने अपनी वीकिपीडिया और कॉपीलेफ्टिंग – फायदा चिट्ठाकारों का की चिट्ठी पर बताया कि मेरे चिट्ठे पर फीड एक्रेगेटरों से कम तथा सर्च कर या फिर मेरे लेखों कि कड़ियों से अधिक लोग आते हैं। यह हमें से बहुतों के साथ सच है। हिन्दी चिट्टाकारी में वह समय आ गया है कि यदि आप अच्छा लिखते हैं तो आपको हटाने में फीड एक्रेगेटर का ही ज्यादा नुकसान है न कि आपका।

इस चिट्ठी को लिखने में, मेरा यह भी मकसद है कि हिन्दी चिट्ठाकारी में वह समय आ गया है जब हिन्दी फीड एक्रेगेटर पहले स्तर से उठ कर, दूसरे स्तर पर पहुंचे। इसमें मुख्य रूप से यह करना चाहियेः

  • पहले चिट्ठों को विषयानुसार अलग किया जाय। जैसा कि ब्लागवाणी या हिन्दी चिट्ठे एवं पॉडकास्ट या हिन्दी जगत या चिट्ठाजगत पर (एक तरीके से, विपुल जी की टिप्पणी देखें) किया गया है। उसके बाद, अलग अलग विषय की फीड को भी अलग अलग दिया जाय जिससे अपने पसन्द के विषय की फीड ली जा सके।
  • चिट्टाचर्चा में नये चिट्ठाकारों का उत्साह वर्धन होता है। यह जरूरी है पर इसके साथ यह भी जरूरी है कि अच्छी चिट्ठियों को उनके सरांश (न कि उनकी पंक्तियों के साथ) पुनः अलग से प्रकाशित किया जाय। ताकि यदि किसी से वह चिट्ठी पढ़ने से छूट गयी हो तो वह पढ़ सके। सरांश तो वही लिख सकता है जो उस चिट्ठी को पढ़े और उसका मर्म समझे। इससे सकारात्मक चिट्ठियां बढ़ेंगी। यह कार्य किसी हद तक कैफे हिन्दी, सारथी, और हिन्दी चिट्ठे एवं पॉडकास्ट में (दायीं तरफ) होता है। इस तरह की कुछ बात देबाशीष जी ने भी एग्रीगेटरों के बहाने से चिट्ठी में कही है हांलाकि मैं इस चिट्ठी की कुछ बातों से सहमत नहीं हूं। मैं जिन बातों से सहमत नहीं हूं वे यहां प्रसांगिक नहीं हैं – वे सब फिर कभी … शायद कभी नहीं :-) वे महत्वपूर्ण नहीं हैं। यदि महत्वपूर्ण नहीं हैं तो उन पर समय नष्ट करना, बेकार है।
  • हिन्दी फीड एक्रेगेटर व्यवसायिक हों। अथार्त वे अपने में पूर्ण हों। वे अपने लिये धन खुद अर्जित कर सकें। यदि अभी धन अर्जित न हो सकता हो तो उस दिशा पर चले, जिससे वे आने वाले समय पर धन अर्जित कर सकने में सक्षम हों। यदि उस फीड एक्रेगेटर के चलाने वाले मुख्य व्यक्ति को उसे चलाने की रुचि समाप्त हो जाय तो भी वे अपने में चलने में सक्षम हो।
  • मेरे विचार से यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है कि किसी भी चिट्ठी के प्रकाशित होने के बाद वह कितनी ज्लदी फीड एक्रेगेटर पर आती है पर यह ज्यादा महत्वपूर्ण है कि वह जब भी आये तब सबसे पहले नंबर पर आये। आने के बाद पूरे समय पहले पेज रहे। ऐसा न हो कि जब वह आये तो नीचे आये या दूसरे पेज पर आये। अथार्त फीड एक्रेगेटर पर वह, वहां पर की गयी पोस्टिंग के अनुसार रहे, न कि उस चिट्ठी के प्रकाशित किये गये समय के अनुसार। उसकी पोस्टिंग पहले पेज पर पहले नंबर पर आने में जितना कम समय लगे उतना ही अच्छा है।

मैंने काफी समय पहले पेटेंट पर एक श्रंखला लिखी थी जिसके एक भाग को सारथी ने यहां पुनः छापा है। उन्होने इसे इसके लायक समझा मेरा आभार, मेरा धन्यवाद, मेरा सौभाग्य। इसे मैंने हिन्दी में पॉडकास्ट भी किया था। जिसे आप मेरी बकबक पर सुन भी सकते हैं।

पत्रकार बनाम चिट्ठाकार

कुछ दिन पहले, हिन्दी चिट्ठाजगत में पत्रकार और चिट्ठाकार के सम्बन्ध में बहस शुरू हुई। शायद यह भी अनुमान लगाया गया कि पत्रकार, चिट्ठाकार क्यों बने। शायद कुछ नये सिद्धान्त भी प्रतिपादित किये गये। यह बहस शायद अभी भी हिन्दी चिट्टाजगत में चल रही है।

मैं ‘शायद’ शब्द का, इसलिये प्रयोग कर रहा हूं क्योंकि मैंने इस विषय पर, एक या दो पोस्ट पढ़ कर, पोस्टें पढ़ना छोड़ दिया। मेरे विचार से, सबको अपनी बात कहने का, चिट्टाकार बनने का अधिकार है।

चिट्टाकारिता करने का अधिकार, उसी तरह से है जैसे कि हिन्दी चिट्ठों की नयी प्रविष्टियां बताने वाली वेबसाइट (जैसे कि नारद, या HindiBlog.com, या हिन्दी चिट्टे एवं पॉडकास्ट) के प्रबन्धतंत्र को अधिकार है कि वे किस चिट्टे की प्रविष्टियां प्रकाशित करें और किसकी नहीं। यदि वे किसी चिट्ठे की प्रविष्टियां अनुपयुक्त पाते हैं तो वे उसे हटा सकते हैं। यदि कोई समझता है कि वे गलत कर रहें हैं तो वह स्वयं उस तरह की दूसरी सेवा शुरू कर सकता है। हमें उनके निर्णय को स्वीकारना होगा। यह अलग बात है कि उनके फैसले के आधार पर, उनकी विश्वसनीयता या निष्पक्षता आंकी जा सकती है।

पत्रकार और चिट्ठाकार के सम्बन्धों के बारे में न केवल हिन्दी चिट्ठाजगत पर अंग्रेजी चिट्ठाजगत पर भी बहस चल रही है। हांलाकि इसका स्वरूप, कुछ भिन्न है।

अंग्रेजी चिट्ठेकार यह कह रहें हैं कि उन्हें भी वही मान्यता और अधिकार मिलने चाहिये जो कि पत्रकारों को मिलते हैं।

पत्रकार कह रहें है कि,

  • चिट्ठेकार न तो पत्रकारों की श्रेणी में हैं;
  • न ही वे पत्रकारों जैसी मान्यता अथवा सुविधायें के अधिकारी हैं;
  • न ही उन्हें चिट्ठेकारों को वे सुविधायें मिलनी चाहिये, जो कि पत्रकारों को मिलती हैं।

आप क्या सोचते हैं? आपको क्या लगता है? क्या चिट्टाकार की श्रेणी पत्रकार से कम है? क्या चिट्टाकार को वह सारी मान्यता तथा अधिकार मिलने चाहिये जो कि पत्रकार को मिलते हैं?

नोट: मैं माफी चाहूंगा। भूलवश, अपनी बात इस चिट्ठी में ठीक से नहीं कह पाया। मैंने इसे अविनाश जी की टिप्पणी के संदर्भ में उनकी टिप्पणी के नीचे स्पष्ट किया है। कृपया इस चिट्ठी को मेरे स्पष्टीकरण के साथ पढ़ें। उससे मेरी मंशा स्पष्ट होगी।

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