दूसरे ग्रहों पर जीवन, उन पर बसेरा – कल्पना आर्थर सी क्लार्क की

इस चिट्ठी में, ‘डिसकवरी साइंस’ (Discovery Science) चैनल पर आ रही ‘प्रॉफेटस् ऑफ साइंस फिक्शन’ (Prophets of Science Fiction) श्रृंखला की आर्थर सी क्लार्क पर कड़ी पर चर्चा है।

प्रॉफेटस् ऑफ साइंस फिक्शन की आर्थर सी कलार्क कड़ी से

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सौ साल पहले…

इस चिट्ठी में, आज के दिन सौ साल पहले वीरता के कारनामे की चर्चा है।

Courtesy - The Folio Society

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विज्ञान कहानियों के पैगम्बर, कल की भविष्यदृष्टा – मेरी शैली

इस चिट्ठी में, ‘डिसकवरी साइंस’ (Discovery Science) चैनल पर आ रही ‘प्रॉफेटस् ऑफ साइंस फिक्शन’ (Prophets of Science Fiction) नामक श्रृंखला के साथ, इसकी मेरी शैली पर पहली कड़ी की चर्चा है।

रिडले स्कॉट 'प्रॉफॅटस् ऑफ साइंस फिक्शन' श्रृंखला का परिचय करावाते हुऐ

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१०० रातों का वायदा, चला ३२१८ रातें

इस चिट्ठी में ऐलिस ऑज़मा के द्वारा लिखित पुस्तक  ‘द रीडिंग प्रॉमिस’ के बारे में चर्चा करते हुऐ बच्चों में पुस्तक प्रेम जगाने के तरीके के बारे में चर्चा है।

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सफलता की सीढ़ी

यह कहना मुश्किल है कि सफलता की सीढ़ी गलत रास्तों से जाती है या सफल लोगों से लोग जलने लग जाते हैं? इस पर बहुत कुछ दोनो तरफ से कहा जा सकता है। यह विषय तो कुछ विवादास्पद है। लेकिन, सफल लोगों के कमजोर पहुलवों पर लिखने वालों की कमी नहीं है।

कुछ समय पहले मैंने ‘लिनेक्स प्रेमी पुरुष – ज्यादा कामुक और भावुक???‘। इस पर रवी जी ने टिप्पणी की,

‘तो क्या खिड़की (विंडोज़) प्रेमी ठंडे और कठोर होते हैं? ;)

उनकी टिप्पणी पर, मैंने एक अन्य चिट्ठी, ‘तो क्या खिड़की प्रेमी ठंडे और कठोर होते हैं?‘ नाम से लिखी। वास्तव में यह HARD DRIVE Bill Gates and the making of the Microsoft Empire by James Wallace & Jim Erickson नामक पुस्तक के बारे में थी जो कि मुख्यतः बिल गेटस् की जीवनी है और उनके कमजोर पक्ष को बताती है। Read more of this post

अरे, यह तो मेरे ध्यान में था ही नहीं

मैंने इसी साल अपने चिट्ठे पर ‘बुलबुल मारने पर दोष लगता है’ श्रृंखला लिखी है। यह श्रृंखला , ‘To Kill A Mockingbird’ उपन्यास के बारे में थी। इसे हार्पर ली (Harper Lee) ने लिखा है। यह उपन्यास  २०वीं शताब्दी के उत्कृष्ट अमेरिकन साहित्य में गिना जाता है। बाद में, इस पर इसी नाम से एक फिल्म भी बनी है। यह मेरी प्रिय पुस्तकों में है। इस पर बनी फिल्म भी, मैंने १९६० के दशक में देखी थी।

इस श्रृंखला में चर्चा थी कि यह उपन्यास क्यों लिखा गया , इसकी क्या कहानी थी, इसकी क्या शिक्षा है। Read more of this post

आज का दिन महत्वपूर्ण है

‘अरे उन्मुक्त जी, क्यों बोर कर रहे हैं। हमें भी मालुम है कि आज अलबर्ट आइन्स्टीन का जन्मदिन है। केवल आप ही नहीं हैं जिसने जीशान जी की बेहतरीन चिट्ठी पढ़ी है। हमने भी उसे पढ़ा है। दूसरों की बात मत दोहराइये।’

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बचपन की प्रिय पुस्तकें

कुछ समय पहले मैंने जूले वर्न के बारे में चिट्ठी पोस्ट की थी। इस चिट्ठी में उनकी कई और पुस्तकों का जिक्र किया था। यह सारी पुस्तकें तथा अंग्रेजी साहित्य एवं अन्य भाषाओं में लिखे प्रसिद्ध उपन्यास, मैंने अपने बचपन में पढ़े थे। इसमें अधिकतर हिन्दी में ही थे।

जुले वर्न की पुस्तक अस्सी दिन में दुनिया की सैर वाली चिट्ठी पोस्ट करते समय मैंने इन पुस्तकों फिर से ढ़ूढ़ना शुरु किया। मुझे यह फिर से मिली और मैंने इनका पूरा सेट फिर से खरीद लिया। यह पुस्तके हैं,

  • 20,000 Leagues Under the Sea समुद्री दुनिया की रोमांचकारी यात्राएं
  • Aesop’s Fables ईसप की कहानियां
  • Alice in Wonderland जादूनगरी
  • Anderson’s Fairy Tales बर्फ की रानी
  • Around the World in 80 Days अस्सी दिन में दुनिया की सैर
  • Black Beauty काला घोड़ा
  • Black Tulip काला फूल
  • Call of the Wild जंगल की कहानी
  • Coral Island मूंगे का द्वीप



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  • Count of Monte Christo कैदी की करामात
  • David Copperfield डेविड कापरफील्ड

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  • Don Quiote तीसमार खां
  • Grimm’s Fairy Tales परियों की कहानियां

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  • Gulliver’s Travels गुलिवर की यात्राएं
  • Ivanhoe वीर सिपाही
  • Kidnapped चांदी का बटन
  • Moby Dick मोबी डिक
  • Pinnochio कठपुतला

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  • Robinhood राबिनहुड
  • Robinson Crusoe राबिन्सन क्रूसो
  • Stories from Arabian Nights जादू का दीपक
  • Swiss Family Robinson अद्भुत द्वीप
  • Talisman चमत्कारी ताबीज
  • The Seven Voyages of Sindbad सिंदबाद की सात यात्राएं

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  • Three Musketeers तीन तिलंगे
  • Tom Sawyer बहादुर टाम
  • Treasure Island खजाने की खोज में

यह पुस्तकें, किशोरों के लिये, सरल हिन्दी में, शिक्षा भारती, मदरसा रोड कश्मीरी गेट, दिल्ली-६ ने प्रकाशित की हैं। यह पुस्तकें बहुत सस्ती हैं – २५ रूपये में एक है। यदि आप सब साथ खरीदें तो कुछ छूट भी हैं। यदि आपके मुन्ने या मुन्नी (८ से १३ साल तक के हों) तो उनके लिये अवश्य खरीदिये।

मुझे तो इन पुस्तकों को फिर से पढ़ने में मजा आया। हो सकता है कि आप को भी आये।

You’re Too Kind – A Brief History of Flattery

हैकर भाई, तुम सर्वशक्तिमान हो। सारी गलती मेरी ही थी। मेरा चिट्ठा वापस करने के लिये शुक्रिया, धन्यवाद।

चिट्ठा वापस पाने में, नानी याद आ गयीः कितनी मिन्नत, कितनी विनती, कितना मक्खन – मैं ही जानता हूं। मक्खन लगाने के लिये तो ‘You’re too Kind’ पुस्तक के सारे टिप्स प्रयोग करने पड़ गये। क्या कहा, आपने इस पुस्तक के बारे में नहीं सुना, चलिये मैं बताता हूं।

इस पुस्तक का पूरा नाम है – ‘You’re Too Kind – A Brief History of Flattery’. इसे रिचर्ड स्टेंगल ने लिखा है। यह पुस्तक वर्ष २००० में प्रकाशित हुई थी। जैसा कि इसका नाम है, यह चाटुकारिता के बारे में है। यह इस विषय की सम्पूर्ण जानकारी देती है। यह पुस्तक एक शोध पत्र की तरह है जिसके कारण यह बहुत बड़ी हो गयी है और कुछ जगह बोर करती है पर यदि आप वहां विस्तार से जानकारी नहीं चाहते हैं तो उसे छोड़ सकते हैं। यह पुस्तक यह भी बताती है कि इतिहास में किस प्रकार चाटुकारिता का प्रयोग कर लोगों ने अपना उल्लू सीधा किया है।

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बाजार में मित्रता और दोस्ती को प्रभावित करने के लिए बहुत सारी पुस्तकें हैं। इनमें सबसे लोकप्रिय पुस्तक डेल कार्नेगी की ‘How to win friends and influence people’ है। डेल कार्नेगी की लिखी पुस्तक या इस तरह की दूसरी पुस्तकों का स्वरूप एक तरह का है पर ‘You’re too kind’, पुस्तक इस विषय पर दूसरा ही रूप प्रस्तुत करती है। संक्षेप में यह पुस्तक कहती है कि,

‘Ultimately we must embrace flattery to redeem praise. Small flatteries are part of the mortar that holds society together. It is one of the daily rituals that help make civil society what we want it to be. Flattery is one of those little things which, even if it is insincere, makes everyday life pleasant in tiny, incremental ways.’

मुझे लगता है कि किसी की कही बात को उसी के शब्दों में लिखना चाहिये, चाहे वह अंग्रेजी में ही क्यों न हो। अनुवाद करना बहुत मुश्किल काम है और शायद एक भाषा का दूसरे भाषा में अनुवाद कर पाना नामुमकिल है। फिर भी मेरी चिट्ठियों पर आयी टिप्पणियों के कारण मैं हिन्दी में अनुवाद करने का प्रयत्न करता हूं।

‘हमें प्रसन्न रहने के लिये चाटुकारिता या दूसरे शब्दों में, सभ्य बातें करना स्वीकार करना होगा। यह छोटी, छोटी बातें, गारे की तरह होती हैं जो कि समाज को एक जुट रखने में सहायक रहती हैं। यह एक रोज़मर्रा कार्य की तरह है जिसके द्वारा हम समाज को उस तरह से ढ़ालते हैं जैसा कि हम उसे रखना चाहते हैं। सभ्य बातें करना, बहुत छोटी सी चीज है यदि वह सही न भी हो तब भी वे जीवन को खुशहाल और सफल बनाती है’

आप यदि इसे हिन्दी चिट्ठाजगत के परिपेक्ष में देखें तो पायेंगे कैसे हम में से कैसे कुछ, इसे खुशहाल बनाते हैं और कुछ तो बस ….

इस पुस्तक की सबसे अच्छी बात, इसके अन्त में है। यहां पर कुछ टिप्स दिये गये हैं कि चाटुकारिता कैसे की जाय और इसे कैसे स्वीकार की जाय। इनमें से कुछ का प्रयोग मैंने हैकर भाई पर कर, अपना चिट्ठा वापस पाया। इनमें से कुछ खास निम्न हैं।

चाटुकारिता कैसे की जाय

  • Find something you really do like: If you’re a bit squeamish about making things up out of whole cloth, find something you honestly admire, and praise it. May be even a little more than it deserves. आप ईमानदारी से दूसरे का वह गुण ढूढ़े जो आपको पसन्द हो और उसकी कुछ ज्यादा प्रशंसा करें चाहे वह उस प्रशंसा का हकदार हो या न हो।
  • Never offer a compliment and ask a favour at the same time: When you charge for a compliment you make the receiver wary. जब आप किसी की प्रशंसा करें उस समय उससे कोई काम के लिये न कहें।
  • Flatter people behind their backs. The virtue of this is, they don’t suspect you of flattery. It makes its way to them through a third party – “He said you were brilliant” – and suddenly your target thinks much more highly of you. लोगों की प्रशंसा उनकी पीठ पीछे करें। इससे उस व्यक्ति को लगता है कि आप उसकी चाटुकारिता नहीं कर रहे हैं और आपको वह विद्वान मान लेता है। उसकी नजर में आप बहुत ऊंचे उठ जाते हैं।
  • Mix a little biter in with the sweet: In other words, blend a tiny criticism with huge praise, e.g., “I thought the play moved a little slowly in the first act, but apart from that I thought it was better than Long Day’s Journey into Night.” आप दूसरे व्यक्ति की तारीफ करते समय, उसकी थोड़ी सी आलोचना भी करें।
  • Tell a Secret: Reveal something intimate. (But not, for example, that you are a shameless flatterer.) This suggests you like and trust the other person that you think she’s understanding and discreet, and that you want the relationship to deepen. You’re flattering her with your trust. आप दूसरे को, अपने जीवन की कोई व्यक्तिगत बात बतायें। यह दूसरे को इसका ऐहसास दिलाता है कि आप उसको बुद्घिमान समझते हैं और उससे गहरी मित्रता चाहते हैं।
  • Ask for advice: We like people who think we are authorities. “Gee, Mr. Green, I was thinking of using that factory in Wisconsin to make widgets. You have a lot of experience with that – what do you think?” सलाह पूछें। हम ऎसे लोगों से प्रसन्न रहते है जो हमें किसी बात का विशेषज्ञ मानते हैं। जैसे कि अक्सर लोग सोचते हैं कि मुझे लिनेक्स के बारे में जानकारी है :-)
  • Ask a small favour: As Plutarch and La Rochefoucauld suggested, we like people for whom we do favours more than people who do favours for us. छोटे मोटे अनुग्रह के लिए कहें। हम जिन पर, कृपा करते हैं उनको हम उन लोगों से अधिक पसंद करते हैं जो हम पर कृपा करते हैं।

चाटुकारिता कैसे स्वीकार की जाय

  • ‘I’m flattered.': This can be said with a feeling of warmth, as though you are acknowledging the person’s kindness, or it can be said with a kind of disingenuous modesty- that is, I completely agree with your evaluation, but it would be rude of me to say so. ‘मुझे प्रसन्नता हुई।’ यह आप गर्माहट और उत्साह के साथ कह सकते हैं। आप शालीनता के साथ यह भी कह सकते हैं कि आप सही हैं पर मेरे लिये यह कहना असभ्यता होगी।
  • ‘I hope you’ll speak at my funeral.': This is ironic; it acknowledges the compliment while showing that you don’t take it all that seriously. ‘मैं आशा करता हूं कि आप मेरे अंतिम संस्कार के समय बोलेंगे।’ यह एक तरह का व्यंग है जो कि यह दर्शाता है कि आप दूसरे की बात गंभीरता से नहीं लेते हैं।
  • Ignore it, but let the person know you received it: This can be done with a smile or a knowing look, but you do not thank the person for it because you don’t want to reckon with any implicit quid pro quo. It’s the gift under the tree you choose not to open. कोई जवाब न दें पर उसे यह अवश्य जता दें कि आपको पता चल गया। आप यह मुस्करा कर या उसकी तरफ देख कर कर सकते हैं।

इस पुस्तक को पढ़ने के बाद मुझे एक वार्तालाप याद आ गया । यह कुछ इस प्रकार का है। एक सहेली ने दूसरी से कहा,

‘तुम इतना सारा क्या पूछती रहती हो, वो परेशान होंगे।’

दूसरी ने कहा,

‘सीखना है तो बिना पूछे कैसे काम चलेगा, अगर वो परेशान होते होंगे तो बता देंगे।’

मैने सोचा,

‘परेशान होंगे! अरे धन्य हुऐ हम। आज तक, किसी ने, हमें इस काबिल समझा ही नहीं।’

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मास्टर और मास्टरनियों को मेरा सलाम

१९६० दशक के पहले भाग में, मेरा स्कूली जीवन बीता। उसी समय To Sir with Love नामक पुस्तक पढ़ी थी। यह पुस्तक ई.आर. ब्रेथवेट ने लिखी है। बाद में इसके ऊपर एक पिक्चर भी बनी। वह भी तभी देखी। यह एक अश्वेत अध्यापक की कहानी है जो कि लंदन के उदण्ड विद्यार्थियों के स्कूल में पढ़ाने जाता है। इस स्कूल में अधिकतर बच्चे श्वेत हैं। यह अश्वेत अध्यापक, इन बच्चों को कैसे ठीक करता है, कैसे वह उनके दिल के करीब पहुंच जाता है, वह एक साल के लिये आया था पर एक साल बाद क्या करता है। बस यही है, इस कहानी में। सिडनी पॉएटर ने पिक्चर में अध्यापक का रोल अदा किया है। यह पुस्तक और पिक्चर दोनो बहुत अच्छी हैं। वह उम्र ही ऐसी होती है जब हम अपने अध्यापक या अध्यापिकाओं को हीरो की तरह देखते हैं। यदि पुस्तक नहीं पढ़ी या पिक्चर नहीं देखी, तो अवश्य पढ़ें और देखें, पसंद आयेगी।

मैं तो यही समझता था कि मैंने पढ़ाई छोड़ी और मास्टरों और मास्टरनियों की दुनिया से छुट्ठी मिली, पर कहां मिली। मुझे तो मिल गयीं मुन्ने की मां, पढाती हैं और घर में भी … बताऊंंगा नहीं, उसने पढ़ लिये तो शामत ही आ जायगी। मैंने मुन्ने की मां को छोड़ कर, अंतरजाल में मन लगाया। जुम्मा, जुम्मा कुछ महीने हुए कि यहां भी मास्टर जी और मास्टरनी जी आ गयीं – लगे छड़ी घुमाने और होम वर्क देने। चिट्ठेकार पकड़े जाने लगे होम वर्क के लिये – पांच सवाल का जवाब दो। मैं तो दो बार यहां और यहां पकड़ा गया। जवाब तो देना पड़ा :-( मेरे जवाब एक अनमोल तोहफ़ा और बनेगे हम सुकरात या फिर हो जायेंगे नील कण्ठ की चिट्ठी पर पढ़े जा सकते हैं।

सवाल भी कैसे, एक से एक कठिन। मैंने आपत्ति की,

‘यह तो बहुत मुश्किल सवाल हैं। मैं कॉपी करके लिखूंगा।’

मुझे तुरन्त बताया गया,

‘जवाब … कॉपी किये हुए नही चलेंगे। No cheating.’

और डांटा गया, अलग से,

‘मै नही मानती कि मेरे सवाल कठिन थे … आप जैसे लोग … सरल बातों को भी कठिन बना लेते हैं। … आपने हमारे लिये …कठिनाई पैदा कर दी है।’

क्या कहने। उलटा चोर कोतवाल को डांटे।

अब आप इन दो सवालों को देखिये फिर बताईये कि यह आसान हैं कि मुश्किल। यह सवाल कुछ सरल भाषा में इस तरह से हैं।

  • आपको किसी दूसरे चिट्टेकार की लिखी हुई कौन सी पोस्ट पसन्द है?
  • आप किस साथी चिट्ठाकार से मिलना चाहते हैं?

नानी याद आ गयी, पसीने छूट गये जवाब लिखने में।

अब आप बताइये कि

  • सच लिखा जाय, या
  • झूट लिखा जाय, या फिर
  • इस सवाल के जवाब को छोड़ दिया जाय।

मजे की बात देखिये यह सवाल कई मास्टर और मास्टरनी जी पूछ रहें हैं।

कईयों ने यह दो सवाल न पूछ कर, सवाल बदल दिये। मैंने भी ऐसा किया था। जिन बेचारों को इन सवालों का जवाब देना पड़ा यदि उनका जवाब पढ़ें, तो यह उनके बारे में न केवल सबसे ज्यादा बताते हैं पर उनकी लेखन कला की परिपक्वत्ता को भी भी चुनौती देते हैं।

यदि आपने इन दोनो सवालों का जवाब नहीं दिया तो सोच कर देखिये की सार्वजनिक रूप में किस प्रकार उत्तर देगें।

सच यह कि मैं यह दो सवाल किसी से न पूंछना चाहूं। अपने मित्र से इसलिये नही कि यदि वह अच्छी तरह से जवाब न दे पाया तो …। अपने दुशमन से इस लिये नहीं, कि यदी उसने बाखूबी से उत्तर दे दिया तो फिर तो उसकी तो धाक जम जायगी।

मुन्ने की मां मुझे बताती है कि अमेरिका में साल के अन्त में विद्यार्थी अपने टीचरों के बारे में अपना मत देते हैं। यह अपने देश में आई आईटी कानपुर में भी होता है, शायद इसलिये कि यह अमेरिकी पैटर्न पर उन्हीं की सहायता से बनी है। यह शायद अपने देश में और कहीं नहीं होता है। क्या पांच सवाल खेल के नियम बदल दिये जांय। जिन जिन मास्टर और मास्टरनी जी ने यह दो सवाल पूछें है और स्वयं इसका जवाब नहीं दिया है तो क्या उनसे यह दो सवाल पूछें जाया।

अन्तरजाल पर सारे मास्टर जी और मास्टरनी जियां काबिल हैं। आज भी, मुझे तो वे सब किसी हीरो या हीरोइन से कम नहीं लगती – बाखूबी से जवाब मिलेगा पर फिर भी …। मैं तो भारत का पढ़ा हूं, न कभी बाहर पढ़ाने का मौका मिला है – अमेरिकन सिस्टम तो मेरे पल्ले नहीं पड़ता।

सांकेतिक चिन्ह

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