क्या कभी आपका मन अशान्त होता है, या मन में अस्थिरिता रहती है, या भविष्य के बारे में अनिश्चित्ता लगती है?
मेरे साथ ऐसा होता है, अक्सर तो नहीं पर कभी कभी।
कुछ लोग ऐसे समय में ज्योतिषों के पास चले जाते हैं तो कुछ पंडितों के पास। कुछ पूजा पाठ में लीन हो जाते हैं तो फिर कुछ स्वामियों, योगियों, साध्वियों की शरण में चले जाते हैं। कुछ नेताओं के शरण में
मैं न तो ज्योतिष, न ही हस्त रेखा या अंक विद्या पर विश्वास करता हूं। मैं मन्दिर जाता हूं – उसकी बनावट या इतिहास जानने के लिये, पर भगवान के दर्शन के लिये नहीं। मैं भगवान पर भी विश्वास नहीं करता – अज्ञेयवादी हूं।
कुछ समय पहले मुझे पुरी जगन्नाथ जी के मन्दिर जाने का मौका मिला। मैंने उसके इतिहास के बारे में जाना, वहां शाम को झन्डे बदलने के कार्यक्रम को देखा पर मन्दिर के अन्दर दर्शन करने नहीं गया। वहां के मुख्य पुजारी, जो पूरे समय मेरे साथ रहे, उसने कई बार मुझसे खास पूजा के लिये कहा पर मेरे मना कर देन पर उसे यह समझ में नहीं आया कि मैं वहां फिर क्या करने गया था। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कोई केवल इसके इतिहास को जानने के लिये मन्दिर में आयेगा।
इस सब के बावजूद भी, जब मेरा मन अशान्त होता है या अनिश्चित्ता होती तो मैं रमायण सुनता हूं या फिर कोई भजन। मैं समझ नहीं पाता कि ऐसा क्यों होता है। दिल को तर्क से नहीं समझा जा सकता है।
‘कौन कहते हैं कि भगवान आते नहीं’ भी ऐसा ही भजन है। इसको सुनने से जो शान्ति मिलती है वह शायद लिखी नहीं जा सकती है, केवल अनुभव की जा सकती है। आप स्वयं सुन कर देखिये।
यदि आप इस भजन के बोल जानना चाहते हैं तो फिर यू-ट्यूब जा कर more info के बटन पर चटका लगा कर पढ़ सकते हैं।
आज का दिन कुछ … अलविदा … फिर … मिलेंगे।

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