छुट-पुट

उन्मुक्त पर मेरे विचार, छुट-पुट पर इधर उधर

कभी प्यासे को पानी पिलाया नहीं

आज सुबह अन्तरजाल में विचरण करते समय मुझे यह भजन सुनने को मिला – दिल को छू गया, कई बार सुना।

आप भगवान पर विश्वास करते हों या नहीं। आप हिन्दू हों या मुसलमान, ईसाई हों या फिर किसी और धर्म के अनुयायी – यह भजन आपको पसन्द आयेगा।

यह भजन दिल के उन तारों को छूता है जो शायद कोई और नहीं।

इस भजन को सुनते समय मुझे पुरानी चिट्ठियों की याद आयी – याद आयी अनुगूंज १८ की।

संजय जी ने, अनुगूंज १८ ‘मेरे जीवन में धर्म का महत्व‘ नाम से आयोजित की थी। मैंने इसके लिये एक चिट्ठी इसी नाम से पोस्ट की थी। दो साल पहले रचना जी के द्वारा टैग किये जाने पर पांच सवालों का जवाब ‘एक अनमोल तोहफ़ा‘ चिट्ठी में दिया था। उस समय, अपनी लिखी चिट्ठियों में मुझे अनुगूंज १८ के लिये लिखी गयी यही चिट्ठी सबसे अच्छी लगी थी। अपनी लिखी चिट्ठियों में, मुझे यह चिट्ठी,  आज भी सबसे अच्छी लगती है। शक नहीं, यह चिट्ठी मेरी लिखी चिट्ठियों में हमेशा सबसे अच्छी चिट्ठी रहेगी, क्योंकि यह मेरे दिल के सबसे पास है।

इस भजन का संगीत हमराज़ फिल्म के इस गाने की धुन पर है – इसे भी सुनिये।

यह भी कर्णप्रिय है

मैं इस चिट्ठी से एक बात और भी कहना चाहता हूं। चिट्ठे पर लिखिये वही – जो आपके दिल को छूता हो, जो आपके दिल के सबसे पास हो। क्योंकि वह आपकी सबसे अच्छी अभिव्यक्ति है।

July 18, 2008 - Posted by उन्मुक्त | दर्शन, विचार | , , | 3 Comments

3 Comments »

  1. सच में बहुत सुन्दर भजन है, आभार।

    Comment by paramjitbai | July 18, 2008

  2. बहुत सुन्दर भजन है, आभार.

    Comment by Sameer Lal | July 18, 2008

  3. दिल को छू लेने वाला भजन है, पता नही कितनी बार सुन चुकी हूँ पर ….

    धन्यवाद।

    Comment by Cuckoo | July 22, 2008


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