मोबाईल फोन में क्रांति और पैसा कमाने का जरिया
यह सच है कि आजकल आई-फोन (iphone) की धूम है। टाइम पत्रिका के १९ नवंबर के अंक ने इसे इस साल का आविष्कार में रखा है पर मैं आई-फोन की बात नहीं कर रहा हूं। यह ओपेन सोर्स पर आधारित नहीं है फिर कैसे क्रांति ला सकता है
भाई मैं तो बात कर रहा हूं गूगल (google) के द्वारा बनाये गये नये ओपेन सोरस सॉफ्टवेर एंड्रॉएड (Android) के बारे में जो कि ओपेन सोर्स है। बहुत से लोग इसे जी-फोन कह रहें है पर यह गलत है क्योंकि गूगल कोई मोबाईल फोन नहीं बना रहा वह तो केवल उस पर चलने वाल एक ओपेन सोर्स सॉफ्टवेर बना रहा है। मोबाईल फोन तो बनायेंगी हार्डवेर कंपनिया जैसे कि मोटोरोला, एलजी, सैमसंग आदि। इस सॉफ्टवेर में क्या है यह तो आप यहां स्वयं देख लीजिये।
इसका एक और प्रदर्शन यह रहा।
है न बढ़िया – मैं तो बस इस फोन के बजार में आने का इंतजार कर रहा हूं।
अरे उन्मुक्त जी यह सब तो ठीक है पर काम की बात बताओ – पैसा कैसे कमाया जायगा।
गूगल कंपनी ने एक कड़ोड़ डॉलर, उन लोगो के लिये अलग कर दिये हैं जो इस सॉफ्टवेर पर कुछ नये उपयोग (appications) बनायेंगे।
धत्त तेरे कि। मैं तो चिट्ठकार हूं यह कैसे करूंगा।
चलिये कुछ नये उपयोगों का सुझाव तो दे ही सकते हैं। मेरी तरफ से सुझाव – यह सॉफ्टवेर हिन्दी (देवनागरी) सक्षम हो और देवनागरी में भी एस.एम.एस. भेजे जा सकें और यदि पैसा मिले तो याद रखा जाय
November 15, 2007 - Posted by उन्मुक्त | सूचना, हिन्दी | android, google, gphone | 4 Comments
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मैं और यह चिठ्ठा
मै हूं उन्मुक्त – हिन्दुस्तान के एक कोने से एक आम भारतीय। मैं उन्मुक्त नाम से एक और चिठ्ठा लिखता हूं। जिसमे आप सब को अपने विचारों से बोर करता हूं। यह अक्सर कड़ियों में करता हूं फिर उन्हें संकलित कर लेख में रखता हूं। टीवी, अखबार, तथा इन्टरनेट पर बहुत कुछ आता रहता है। इस चिठ्ठे पर, उनमे से कुछ के बारे मे जिक्र करके आपको बोर करूंगा – यदि आप पहले से पढ़ कर बोर नहीं हुए होंगे तो।
मेरे एक मित्र के पुत्र की आखें कमजोर हैं वह अक्सर ऐसे प्रोग्राम के बारे में पूछता रहता है जिसमें पढ़ना न पड़े और वह सुन सके। इसलिये एक पॉडकास्ट ‘बकबक‘ नाम से शुरू की। पॉडकास्ट की अधिकतर फाईलें ogg, ओपेन सोर्स फॉरमैट, मे हैं। इस फॉरमैट की फाईलों को आप,
- Windows पर कम से कम Audacity एवं Winamp में;
- Linux पर लगभग सभी प्रोग्रामो में; और
- Mac-OX पर कम से कम Audacity में,
सुन सकते हैं। यह ogg फॉरमैट में क्यों है इसके बारे में आप मेरी चिट्ठी ‘पापा, क्या आप इलझन में हैं‘ पर पढ़ सकते हैं। यदि इसे एमपी-३ मानक में सुनना चाहें तो यहां चटका लगा कर सुन सकते हैं।
मेरे तीनो चिट्ठों एवं पॉडकास्ट की सारी पोस्टें, कौपी-लेफ्टेड हैं। आपको इनका प्रयोग व संशोधन करने की स्वतंत्रता है। मुझे प्रसन्नता होगी यदि आप ऐसा करते समय इसका श्रेय मुझे (यानि कि उन्मुक्त को), या इस पॉडकास्ट को दें और अच्छा हो कि उस पोस्ट से लिंक दे दें। मुझे और भी प्रसन्नता होगी यदि इनका उपयोग ऐसे लोगों के लिये किया जा सके जिनकी आखें कमज़ोर हैं। यह सारी सामग्री क्रिएटिव कॉमन शून्य (Creative Commons-0 1.0) लाईसेन्स के अन्तर्गत है। यह इनके द्वारा निकाला नया लाइसेन्स है। इसमें लेखक कोई भी अधिकार अपने पास नहीं रखता है। इसकी शर्तें नायाब हैं इनको यहां देखें।
इस चिट्ठे की सामग्री क्रिएटिव कॉमन शून्य (Creative Commons-0 1.0) लाईसेन्स के अन्तर्गत है। यह इनके द्वारा निकाला नया लाइसेन्स है। इसमें लेखक कोई भी अधिकार अपने पास नहीं रखता है। इसकी शर्तें नायाब हैं इनको यहां देखें।
मैंने एक फीड एक्रेगेटर चिट्ठे और पॉडकास्ट नाम से बनाया है। इसमें देवनागरी में लिखे सारे चिट्ठों की प्रविष्टियों की सूचना आती है। इसका भी आप जैसा चाहे वैसा प्रयोग कर सकते हैं।
मेरी पत्नी भी एक चिट्ठा ‘मुन्ने के बापू‘ के नाम से ब्लॉगर पर लिखती है। हमारे में बारे में आप ‘भारतीय भाषाओं के चिट्ठे जगत की सैर‘ चिट्ठी पर पढ़ सकते हैं। मुझसे सम्पर्क का पता यह है।
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बकबक पर नयी प्रविष्टियां-
बकबक पर पॉडकास्ट कैसे सुने
बकबक पर अधिकतर ऑडियो क्लिपें ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप,* Windows पर कम से कम Audacity एवं Winamp में;
* Linux पर लगभग सभी प्रोग्रामो में; और
* Mac-OX पर कम से कम Audacity में,
सुन सकते हैं। ऑडियो क्लिप पर चटका लगायें फिर या तो डाउनलोड कर ऊपर बताये प्रोग्राम में सुने या इन प्रोग्राम को अपने कंप्यूटर में डिफॉल्ट में कर ले। मैंने इसे ogg फॉरमैट में क्यों रखा है यह आप मेरे उन्मुक्त चिट्ठे की पापा, क्या आप उलझन में हैं चिट्ठी पर पढ़ सकते हैं। यदि इसे mp3 फॉरमैट में सुनना चाहें तो यहां चटका लगायें। -
मेरे पॉडकास्ट बकबक की फीड
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मैं और यह चिठ्ठा
मै हूं उन्मुक्त - हिन्दुस्तान के एक कोने से एक आम भारतीय। मैं ' उन्मुक्त' नाम से एक और चिठ्ठा लिखता हूं। जिसमे आप सब को अपने विचारों से बोर करता हूं। यह अक्सर कड़ियों में करता हूं फिर उन्हें संकलित कर ' लेख' में रखता हूं। टीवी, अखबार, तथा इन्टरनेट पर बहुत कुछ आता रहता है। इस चिठ्ठे पर, उनमे से कुछ के बारे मे जिक्र करके आपको बोर करूंगा - यदि आप पहले से पढ़ कर बोर नहीं हुए होंगे तो। मेरे एक मित्र के पुत्र की आखें कमजोर हैं वह अक्सर ऐसे प्रोग्राम के बारे में पूछता रहता है जिसमें पढ़ना न पड़े और वह सुन सके। इसलिये एक पॉडकास्ट ' बकबक' नाम से शुरू की। मेरे तीनो चिट्ठों एवं पॉडकास्ट की सारी पोस्टें, कौपी-लेफ्टेड हैं। आपको इनका प्रयोग व संशोधन करने की स्वतंत्रता है। मुझे प्रसन्नता होगी यदि आप ऐसा करते समय इसका श्रेय मुझे (यानि कि उन्मुक्त को), या इस पॉडकास्ट को दें और अच्छा हो कि उस पोस्ट से लिंक दे दें। मुझे और भी प्रसन्नता होगी यदि इनका उपयोग ऐसे लोगों के लिये किया जा सके जिनकी आखें कमज़ोर हैं। मैंने एक फीड एक्रेगेटर उन्मुक्त नाम से बनाया है। इसमें देवनागरी में लिखे सारे चिट्ठों की प्रविष्टियों की सूचना आती है। इसका भी आप जैसा चाहे वैसा प्रयोग कर सकते हैं। मेरी पत्नी भी एक चिट्ठा ' मुन्ने के बापू' के नाम से ब्लॉगर पर लिखती है। हमारे में बारे में आप 'भारतीय भाषाओं के चिट्ठे जगत की सैर' चिट्ठी पर पढ़ सकते हैं। मुझसे समपर्क का पता यह है -
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मैंने इन्हें भी देखा – मेरे देवनागरी चिट्ठे एवं पॉडकास्ट सेकुछ कड़ियां
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आपका पहला वाला वीडियो नहीं चल रहा जी.
काकेश जी, मैंने अभी चलाया तो चल रहा है। चलने में कुछ समय लगता है इसलिये आपको ऐसा लगा हो। ऐसे इसका यू-ट्यूब में लिंक यहां है। आप वहां जा कर देख सकते हैं।
रचना जी की चिट्ठी पर, आपने टिप्पणी की थी कि रचना जी की तरह आप मेरी चिट्ठियां पढ़ते हैं पर उनकी तरह आपको भी समझ में नहीं आता है कि क्या टिप्पणी करें। चलिये इसी बहाने आपने टिप्पणी तो की
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आपका हिन्दी एण्ड्राय हेतु सुझाव बढ़िया है. निश्चित ही यह आसान इंटरनेशनलाइजेशन के सिद्धांत पर बना होगा, और हम इसका आसानी से हिन्दी में अनुवाद कर सकते हैं. यदि आपके पास समय हो तो कुछ अनुसंधान कर अनुवाद करने वाले जालस्थल का अता पता बताएँ.
रवी जी, पैसे की बात पहले विडियो में बतायी गयी है। मैंने उसी को सुन कर लिखा है। यह गूगल से ही मिलना चाहिये। यही बात लिनेक्स फॉर यू पत्रिका के दिसम्बर २००७ भाग में लिखी है। इस भाग में एंड्रॉएड पर एक ज्ञानवर्धक लेख भी है। – उन्मुक्त।
चलिये अब यह चल रहा है. जी टिप्पणी करने को कुछ समझ में नहीं आता कि क्या कहूँ और वाह वाह..या अति सुन्दर की आपको आवश्यकता ही नहीं है.
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