छुट-पुट

उन्मुक्त पर मेरे विचार, छुट-पुट पर इधर उधर

अंतरजाल पर हिन्दी कैसे बढ़े

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काश
बालों में उलझती, खुद को उलझाती
तेरे चेहरे पे सरसराती
मेरी उंगलिया होठों पर रुक जातीं
कान मॆ धीमे से गुनगुनातीं

kaash.jpg

अधखुली अधजगी आखॊ में
अनगिनत सपने लिए
तेरे बदन की खुशबू को
अपनी रूह में बसाती

कुछ सिमट-सिकुड कर
तेरी बाहॊ में टूट जाती
काश ऐसा हो पाता
तू मेरा और मैं तेरी हो पाती

मैं अच्छा शीर्षक का झांसा दे कर, कविता नहीं पढ़वाना चाहता हूं। मैंने यह कविता नहीं लिखी है और न ही यह चित्र मेरे द्वारा खींचा गया है। कविता लिख पाना मेरे बस का नहीं है और न ही इतना सुन्दर चित्र खींच पाना। यह कविता और चित्र तो मैंने One from Cuckoo’s Nest नाम के चिट्ठे की इस चिट्ठी से चुराया है। वहां ये creative commons 2.5 के अन्दर प्रकाशित किया है (यह चिट्ठा और यह चिट्ठी इस समय अपने नये पते, यहां और यहां है)। इसलिये यह कविता और चित्र यहां भी इसी लाइसेन्स के अन्दर है। और बाकी सारा माल, नीचे के कार्टून को छोड़ कर, मेरी शर्तों के अन्दर प्रकाशित है।

कल इस चिट्ठे का जन्मदिन था। केक खाने को तो नहीं मिला पर उन्हें यह चिट्ठी, हिन्दी चिट्टा जगत की तरफ से भेंट है।

पर उन्मुक्त जी, यह चिट्ठा जिससे आपने यह कविता ली है वह तो किसी हिन्दी फीड एग्रेगेटर पर नहीं आता है फिर आपको कैसे मिला?

बताता हूं और मुद्दे पर भी आता हूं।

मैंने हिन्दी चिट्ठाकारिता, मोक्ष और कैफे हिन्दी की चिट्ठी लिखते समय तीन हिन्दी फीड एक्रेगेटर के बारे में बात की थी। उसके बाद तो जिसे देखो वही फीड एग्रेगेटर बना रहा है। लोग तो कह रहें हैं कि हिन्दी फीड एग्रेगेटर ज्यादा हो रहे हैं चिट्ठे कम :-)

aggregator-blog.png

यह कार्टून मजेदार समाचार चिट्ठे की इस चिट्ठी से लिया गया है।

खैर, इससे मुझे क्या लेना देना। मैंने भी एक अपना फीड एग्रेगेटर बना दिया – ‘देवनागरी चिट्ठे‘। (किसी कारणवश इस चिट्टी के पोस्ट हो जाने के बाद, उपर वाले फीड एग्रेगेटर को छोड़ कर दूसरा फीड एग्रेगेटर उन्मुक्त – हिन्दी चिट्ठों और पॉडकास्ट में नयी प्रविष्टियां नाम से बनाना पड़ा। इसमें वह सब खासियत हैं जो कि पुराने में थी और उससे बेहतर है।)

मेरा फीड एग्रेगेटर बहुत अच्छा है। यह सबकी चिट्ठियों की खबर रखता है, किसी के साथ भेदभाव नहीं है। इसको चलाने में एक भी धेला खर्चा नहीं होता है, न कोई समय लगता है – यह सारे काम अपने आप करता है। इसमें आप किसी भी भाषा में लिखते हों यदि देवनागरी लिपि में लिखेंगे तो यहां आ जायगा। इसको बनाने में कोई तकनीकी ज्ञान नहीं चाहिये।

हो गये न प्रभावित मुझसे :-)

खैर यह तो मैं आपको बिलकुल नहीं बताउंगा कि मैंने यह विचार कहां से कॉपी किया है या किसने मुझे इसकी टिप्स दी हैं। यदि बता दूंगा तो आप मुझे छोड़ कर, उसी की तारीफ करने लगोगे :-)

अपने इसी फीड एग्रेगेटर पर देखते समय, मैं इस चिट्टे पर पहुंच गया। यह चिट्ठा मुलतः अंग्रेजी में है जिसमें कुछ चिट्ठियां हिन्दी में हैं। यह कविता और चित्र अच्छे लगे, तुरन्त कॉपी कर, अपने चिट्ठे में लगाये।

लगता है कि आप गुस्सा कर रहें हैं शांत हो जांय, मैं तुरन्त शीर्षक की बात करता हूं।

एक बार, अनूप जी ने मेरा परिचय देते समय कहा कि, मैं बहुत कम टिप्पणी करता हूं। यह कुछ हद तक सही है। टिप्पणी न कर पाने का कारण भी मैंने आभार, धन्यवाद, बधाई नाम की चिट्ठी में स्पष्ट किया है।

मैं अक्सर ऐसे चिट्ठों पर अवश्य जाता हूं जो किसी भी नियमित हिन्दी फीड एग्रेगेटर पर नहीं आते हैं और जितनी टिप्पणियां मैं नियमित हिन्दी फीड एग्रेगेटर के चिट्ठों पर करता हूं उससे कहीं अधिक, ऐसे चिट्ठों पर करता हूं जो किसी भी नियमित हिन्दी फीड एग्रेगेटर में नहीं आते हैं। यह चिट्ठे अक्सर अंग्रेजी में होते हैं जिसमें हिन्दी की कुछ चिट्ठियां होती हैं या फिर हिन्दी के एकदम नये चिट्ठे। इनमें से कई वापस मेरे चिट्ठे पर आते हैं, इमेल करते हैं, और कईयों ने हिन्दी में लिखना शुरु कर दिया – कुछ नियमित हिन्दी फीड एग्रेगेटरों से जुड़ भी गये।

यदि हम सब भी कुछ ऐसे चिट्टों पर जा कर टिप्पणी करें तो जरूर ऐसे लोगों का उत्साहवर्धन होगा। यह लोग हिन्दी में और लिखेंगे। अन्तरजाल पर हिन्दी बढ़ेगी। ऐसे अनुनाद जी ने यहां बहुत अच्छे उपाय बतायें हैं यदि पढ़ने से रह गये हों तो अवश्य पढ़ें और हो सके तो अमल भी करें।

काश,
वे हिन्दी में और भी लिखती,
हम सब को सुनवाती,
हिन्दी चिट्ठाजगत पर सरसराती
काश ऐसा हो पाता
कि वे हिन्दी की और हिन्दीजगत उनका हो पाता।

यह बताना तो भूल ही गया कि इन चिट्ठियों पर टिप्पणी करते समय मुझे अक्सर उनसे भी मुलाकात होती है। वे वहां पर पहले से ही टिप्पणी करे बैठे होते हैं।

कौन हैं वे शख्स, जरा हमें तो भी बताइये।

अरे वही, जिनकी चिट्ठी से मैंने यह आइडिया चुराया है। नाम तो नहीं बताउंगा, बवाल शुरू हो जायगा।

हां मेरे हिन्दी फीड एक्रेगेटर पर जा कर एक नजर डाल दीजयेगा :-)

किसी कारणवश इस चिट्टी के पोस्ट हो जाने के बाद, उपर वाले फीड एग्रेगेटर को छोड़ कर दूसरा फीड एग्रेगेटर उन्मुक्त – हिन्दी चिट्ठों और पॉडकास्ट में नयी प्रविष्टियां नाम से बनाना पड़ा। इसे ही देखिये :-)

मेरा यह सब लिखने का कुछ और मकसद भी हैः

  • इस समय बहुत से हिन्दी फीड एक्रेगेटर हैं। सब अच्छे हैं और एक छोटे स्तर का हिन्दी फीड एक्रेगेटर (जैसा कि मेरा है) बनाना बहुत आसान है। यदि किसी कारण किसी एक्रेगेटर ने आपकी फीड हटा दी है या आपकी किसी चिट्ठी पोस्ट होने में कुछ देर हो गयी (जो कि केवल तकनीक के कारण से होती है) तो इस पर विवाद करने की या फिर सबको ईमेल कर, समय बर्बाद करने से अच्छा है कि, बढ़िया सी चिट्ठी पोस्ट की।
  • मैंने अपनी वीकिपीडिया और कॉपीलेफ्टिंग – फायदा चिट्ठाकारों का की चिट्ठी पर बताया कि मेरे चिट्ठे पर फीड एक्रेगेटरों से कम तथा सर्च कर या फिर मेरे लेखों कि कड़ियों से अधिक लोग आते हैं। यह हमें से बहुतों के साथ सच है। हिन्दी चिट्टाकारी में वह समय आ गया है कि यदि आप अच्छा लिखते हैं तो आपको हटाने में फीड एक्रेगेटर का ही ज्यादा नुकसान है न कि आपका।

इस चिट्ठी को लिखने में, मेरा यह भी मकसद है कि हिन्दी चिट्ठाकारी में वह समय आ गया है जब हिन्दी फीड एक्रेगेटर पहले स्तर से उठ कर, दूसरे स्तर पर पहुंचे। इसमें मुख्य रूप से यह करना चाहियेः

  • पहले चिट्ठों को विषयानुसार अलग किया जाय। जैसा कि ब्लागवाणी या हिन्दी चिट्ठे एवं पॉडकास्ट या हिन्दी जगत या चिट्ठाजगत पर (एक तरीके से, विपुल जी की टिप्पणी देखें) किया गया है। उसके बाद, अलग अलग विषय की फीड को भी अलग अलग दिया जाय जिससे अपने पसन्द के विषय की फीड ली जा सके।
  • चिट्टाचर्चा में नये चिट्ठाकारों का उत्साह वर्धन होता है। यह जरूरी है पर इसके साथ यह भी जरूरी है कि अच्छी चिट्ठियों को उनके सरांश (न कि उनकी पंक्तियों के साथ) पुनः अलग से प्रकाशित किया जाय। ताकि यदि किसी से वह चिट्ठी पढ़ने से छूट गयी हो तो वह पढ़ सके। सरांश तो वही लिख सकता है जो उस चिट्ठी को पढ़े और उसका मर्म समझे। इससे सकारात्मक चिट्ठियां बढ़ेंगी। यह कार्य किसी हद तक कैफे हिन्दी, सारथी, और हिन्दी चिट्ठे एवं पॉडकास्ट में (दायीं तरफ) होता है। इस तरह की कुछ बात देबाशीष जी ने भी एग्रीगेटरों के बहाने से चिट्ठी में कही है हांलाकि मैं इस चिट्ठी की कुछ बातों से सहमत नहीं हूं। मैं जिन बातों से सहमत नहीं हूं वे यहां प्रसांगिक नहीं हैं – वे सब फिर कभी … शायद कभी नहीं :-) वे महत्वपूर्ण नहीं हैं। यदि महत्वपूर्ण नहीं हैं तो उन पर समय नष्ट करना, बेकार है।
  • हिन्दी फीड एक्रेगेटर व्यवसायिक हों। अथार्त वे अपने में पूर्ण हों। वे अपने लिये धन खुद अर्जित कर सकें। यदि अभी धन अर्जित न हो सकता हो तो उस दिशा पर चले, जिससे वे आने वाले समय पर धन अर्जित कर सकने में सक्षम हों। यदि उस फीड एक्रेगेटर के चलाने वाले मुख्य व्यक्ति को उसे चलाने की रुचि समाप्त हो जाय तो भी वे अपने में चलने में सक्षम हो।
  • मेरे विचार से यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है कि किसी भी चिट्ठी के प्रकाशित होने के बाद वह कितनी ज्लदी फीड एक्रेगेटर पर आती है पर यह ज्यादा महत्वपूर्ण है कि वह जब भी आये तब सबसे पहले नंबर पर आये। आने के बाद पूरे समय पहले पेज रहे। ऐसा न हो कि जब वह आये तो नीचे आये या दूसरे पेज पर आये। अथार्त फीड एक्रेगेटर पर वह, वहां पर की गयी पोस्टिंग के अनुसार रहे, न कि उस चिट्ठी के प्रकाशित किये गये समय के अनुसार। उसकी पोस्टिंग पहले पेज पर पहले नंबर पर आने में जितना कम समय लगे उतना ही अच्छा है।

मैंने काफी समय पहले पेटेंट पर एक श्रंखला लिखी थी जिसके एक भाग को सारथी ने यहां पुनः छापा है। उन्होने इसे इसके लायक समझा मेरा आभार, मेरा धन्यवाद, मेरा सौभाग्य। इसे मैंने हिन्दी में पॉडकास्ट भी किया था। जिसे आप मेरी बकबक पर सुन भी सकते हैं।

July 15, 2007 - Posted by उन्मुक्त | hindi, विचार, हिन्दी | | 14 Comments

14 Comments »

  1. ब्लागवाणी के लिये नये चिठ्ठे खोजते समय हमें हिन्दी चिठ्ठे एवं पाडकास्ट से बहुत मदद मिलती है. इनके चिठ्ठे खोजने के काम का कोई जबाब नहीं.
    अनुनाद जी के उपाय तो बहुत ही काम के हैं

    Comment by मैथिली | July 15, 2007

  2. “पहले चिट्ठों को विषयानुसार अलग किया जाय। जैसा कि ब्लागवाणी या हिन्दी चिट्ठे एवं पॉडकास्ट या हिन्दी जगत पर किया गया है। उसके बाद, अलग अलग विषय की फीड को भी अलग अलग दिया जाय जिससे अपने पसन्द के विषय की फीड ली जा सके। ”

    ऐसा चिट्ठाजगत पर किया जाता है, हर श्रेणी की फीड़ भी उपलब्ध है।
    http://www.chitthajagat.in/?shrenee=कविता
    http://www.chitthajagat.in/feed.xml?shrenee=कविता
    http://www.chitthajagat.in/?shrenee=व्यंग्य
    http://www.chitthajagat.in/feed.xml?shrenee=व्यंग्य
    http://www.chitthajagat.in/?shrenee=सूचना
    http://www.chitthajagat.in/feed.xml?shrenee=सूचना

    etc……

    ध्यान दें श्रेणी और सांकेतिक शब्द अलग हैं।

    विपुल

    विपुल जी, यह बहुत अच्छी बात है। मैं माफी चाहूंगा कि मैं यह नहीं लिख पाया। मैं लेख को संशोधित कर देता हूं।
    उन्मुक्त

    Comment by विपुल | July 15, 2007

  3. Meri post ki jin btaon se aap sehmat nahi agar sarvajanik nahi karna chahte to mujhe email dwara bata dein. Vichaar rakhne ke liye hee to hum sab blogging karte hein. Ho sakta hei aapke bindu mere liye mahatvapurna hon :)

    Comment by Debashish | July 15, 2007

  4. वाह भाइ देबाशीश तुम किसी की भी पोस्ट पर कुछ भी लिख मारो पर तुमे ईमेल करे क्या बात है इतना डरते हो तो लिखना छोड दो :)

    Comment by arun | July 15, 2007

  5. आपने बहुत ही विस्तार से हिन्दी चिट्ठाकारी, हिन्दी चिट्ठाकारों, व एग्रीगेटरों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बातें लिखी हैं.

    मैं भी प्रारंभ से यही कहता आ रहा हूँ कि कोई भी प्रकल्प वित्तीय रूप से स्वयं-सक्षम हो तो उसके चलते रहने की संभावना बलवती होती है, और यदि वह प्रकल्प अपने मालिक को फ़ायदा पहुँचाने लगे तो उसके दौड़ते रहने की भी, और त्वरण प्राप्त करते रहने की भी!

    Comment by रवि | July 15, 2007

  6. बुरा मत मानिएगा पर भाई इतनी लंबी पोस्ट पढ़ते-पढ़ते हम थोड़ा -बहुत थक गए थे पर जब आपके हिंदी feed एक्रेग्रेटर पर गए तो अपने ब्लॉग का नाम देखकर सारी थकान दूर हो गयी। बधाई हो!

    ममता जी,
    हिन्दी चिट्ठा जगत पर चल रही बहसों ने दुखी कर दिया था, मन भरा था। बहुत दिनो से लिखने की सोच रहा था पर कह नहीं पा रहा था। आज मौका मिला तो सब कह डाला – मन भी हलका हो गया। बस इसीलिये यह चिट्ठी लम्बी हो गयी वरना तो मैं भी, छोटी चिट्ठी लिखने पर विश्वास करता हूं।
    आपको तो याद है, आप भी किसी हिन्दी फीड एक्रेगेटर पर नहीं आती थी। जो कारण मैंने यहां बताये हैं उसी के लिये अंतरजाल पर विचरण करते समय, आप मुझे मिली थीं। बस मैंने आपके चिट्ठे पर टिप्पणी कर दी। फिर तो आप, हिन्दी चिट्ठा जगत में छा ही गयीं।
    उन्मुक्त

    Comment by mamta | July 15, 2007

  7. बहुत ही रोचक तरीके से आपने अपनी बात कही।

    Comment by जगदीश भाटिया | July 15, 2007

  8. बहुत अच्छी तरह आपने अपने विचार व्यक्त किये। शुक्रिया।

    Comment by अनूप शुक्ल | July 16, 2007

  9. पढ़ते डगरते पूरा पढ़ ही गये. जानकारी भी रोचक लगी. जरा डिटेल में बताये एग्रिगेटर बनाने का तरीका तो कुछ हाथ आजमाया जाये. सब कर ले रहे हैं बस हम ही छुटे जा रहे हैं. :) वो कौन था जो पहले से टिप्पणी करके विराजमान था वो भी हमसे भी पहले?? गलत बात. :)

    Comment by समीर लाल | July 16, 2007

  10. सहर्ष धन्यवाद।
    मुझे ख़ुशी है की आपको मेरी कविता पसंद आई और उसे अपने चिट्ठे पर छापने के लायक समझा। मेरी कोशिश रहेगी कि मैं हिंदी में लिखना जारी रख सकूं। समय की पाबंदी से ज़रा कठिन हो जाता है। क्या आपने मेरी अन्य हिंदी कवितायेँ पढ़ी हैं ?

    मैंने एक सामूहिक हिंदी ब्लॉग पर लिखना भी आरम्भ किया था लेकिन कुछ समय बाद लगा की कुछ खास प्रगति नहीं हो रही है या यूं कहिये कुछ बात बन नहीं रही है। सो अपने ही ब्लॉग पर लिखने से कम से कम ये तसल्ली तो है की मेरी कवितायेँ ज़्यादा लोगों तक पहुँच रहीं हैं। लोग जितना ज़्यादा पसन्द करते हैं उतना ही मन उत्साहित होता है और लिखने को।

    फ़िर एक बार धन्यवाद। आते रहिए, लुत्फ़ उठाते रहिए और हौसला अफज़ाई करते रहिए।

    Comment by Cuckoo | July 16, 2007

  11. एक बात और। आप मीठे ताने मारने में माहिर हैं। :P

    नोट- मैं हिंदी ब्लॉग जगत में कुहू के नाम से जानी जाती हूँ।

    Comment by कुहू | July 16, 2007

  12. अरे मैंने इतनी बड़ी टिपण्णी लिखी थी, कहॉ गयी?
    Kya ek baar sirf ek comment hee leta hai WP?

    Comment by कुहू | July 16, 2007

  13. जानकारीपूर्ण अच्छा आलेख है।

    फिलहाल देवनागरी युनिकोड पाठ त्रिस्तरीय होने के कारण इण्डेक्सिंग आदि में अनेक तकनीकी समस्याएँ पैदा होती हैं। Linear Indic की संकल्पना इसका समाधान है। किन्तु अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता कैसे मिलेगी? बिल्ली के गले में घण्टी कौन बाँधेगा।

    Comment by हरिराम | November 8, 2007

  14. [...] सहाना जी, बैंगलोर की रहने वाली हैं पर आजकल मुम्बई में पढ़ती हैं। वे अधिकतर अंग्रेजी में चिट्ठाकारी करती हैं पर कभी कदा हिन्दी में चिट्ठियां लिख देती हैं बस उनकी हिन्दी की एक चिट्ठी मेरे उन्मुक्त हिन्दी चिट्ठे फीड एग्रेगेटर के पकड़ में आ गयी। वहां पहुंच कर जब चिट्ठे को देखने लगा तो उनके द्वारा प्रकाशित, यह  कविता पसन्द आयी। इसमें रुमानी भावनाओं का अपना ही अन्दाज़ है।वहीं से यह चुरायी गयी है। मैंने कविता के शब्दों में कुछ बदलाव किये हैं। उनकी मूल कविता वहीं, उसी चिट्ठी पर पढ़ें। उसी चिट्ठी से मैंने इस चिट्ठी का पहला चित्र भी चुराया है।  कुहू जी  भी,  मुझें इसी तरह से अन्तरजाल पर मिली थीं। [...]

    Pingback by मुझे मिलना उस मोड़ पर « छुट-पुट | February 4, 2009


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