क्या हिन्दी वीकिपीडिया पर लेख लिखने और चिट्ठियों को कॉपीलेफ्टिंग करने से कुछ फायदा होता है। जी हां, बहुत कुछ।

‘तो भाई, पहले क्यों नहीं बताया। लगता है कि अकेले ही फायदा लेते रहे।’

चलिये अब बता देता हूं।

मेरे इस चिट्ठे पर, अन्तरजाल में क्या है, के बारे में मेरी टिप्पणियों के साथ चिट्ठियां रहती हैं।

उन्मुक्त चिट्ठा, मेरा मुख्य चिट्ठा है। इस पर मेरे विचार रहते हैं पर यह अक्सर कड़ियों में रहते हैं। किसी भी विचार पर लिखने के पहले मे रूप रेखा तो बना लेता हूं पर लेख कड़ियों के साथ ही लिखता हूं - एक साथ बड़ा लेख लिखना मुश्किल रहता है। लेखों को कड़ियों मे लिखने मे आसानी होती है पर पढ़ने मे पूरे लेख ही अच्छे लगते हैं - कारण,

  • दो कड़ियों के बीच अक्सर कुछ और चिठ्ठियां भी आ जातीं है जिससे निरतरता भंग होती है;
  • कड़ियों मे लिखने से तारत्म्यता भी गड़बड़ होती है।

इससे लगा कि बाद मे सारी कड़ियों को जोड़ कर पूरे विषय पर सामग्री एक जगह कर दिया जाय और यदि उस विषय पर कुछ नया आये तो कड़ियों पर जोड़ने की जगह वहीं पर पर जोड़ा जाय तो ठीक रहेगा तथा उस विषय पर एक जगह पूरी जानकारी भी रहेगी और एक साथ पढ़ने का आनंद ही अलग है। यह कार्य मैं अपने लेख चिट्ठे पर करता हूं। जब मैंने इसे शुरू किया, तब मुझे हिन्दी वीकिपीडिया के बारे में नहीं मालुम था।

कुछ दिनो बाद मितुल जी ने मेरे लेख चिट्टे पर टिप्पणी कर मुझे हिन्दी वीकिपीडिया पर लिखने की सलाह दी और यह सफर भी मैंने ज्लद ही तय किया। मैंने दो और चिट्ठिया हिन्दी वीकिपीडिया के बारे में यहां और यहां लिखी हैं। मैं लेख पर चिट्ठियां प्रकाशित करने के बाद, यदि वे हिन्दी विकीपीडिया पर डालने लायक हैं तो, वह भी करता हूं।

मेरे सारे चिट्ठों की चिट्ठयां और पॉडकास्ट (बकबक) कॉपीलेफ्टेड हैं। आपको भी उन्हे वीकिपीडिया पर डालने की तथा उसी तरह से प्रयोग करने की अनुमति है जैसा कि कैफे हिन्दी में किया गया है। मेरे लेख चिट्ठे की, की कुछ चिट्ठियां जो वीकिपीडिया में नहीं हैं वे कैफे हिन्दी में प्रकाशित हैं।

मेरा उन्मुक्त और छुटपुट चिट्टा सारे हिन्दी फीड एग्रेगेटर पर आते हैं पर लेख चिट्टा नहीं आता। मैंने इसे स्वयं कहीं नहीं रजिस्टर करवाया। इसका कारण यह था कि इसमें कोई नयी बात नहीं रहती है पर वही रहती है जो उन्मुक्त चिट्ठे पर प्रकाशित हो चुकी होती है। मेरे उन्मुक्त चिट्टे पर १७१ चिट्ठियां हैं। इनको १४,००६ बार देखा गया है, अथार्त प्रति चिट्ठी लगभग ८२ बार। मेरे छुटपुट चिट्टे पर (इस चिट्ठी को छोड़ कर) ६८ चिट्ठियां हैं। इनको ५५०६ बार देखा गया है, अथार्त प्रति चिट्ठी ८१ बार। मेरे लेख चिट्टे पर १२ चिट्ठियां हैं, अथार्त इनको १५१७ बार देखा गया है, अथार्त प्रति चिट्ठी १२६ बार।

इससे यह स्पष्ट होता है कि सबसे ज्यादा बार मेरे लेख चिट्टे की चिट्ठियों को देखा गया है। आप तो यही सोचते होंगे,

‘जब यह किसी फीड एग्रेगेटर में आता नहीं है तो लोग कैसे इस पर आते हैं।’

इस पर लोग हिन्दी वीकिपीडिया, कैफे हिन्दी और सर्च करके आते हैं। हुआ न फायदा हिन्दी वीकिपीडिया पर लेख लिखने का और कॉपीलेफ्टिंग करने का। लोग अपने आप आते हैं पढ़ने के लिये। ऐसे मैंने यह बात, जब कैफे हिन्दी की आलोचना हो रही थी तब, ‘डकैती, चोरी या जोश या केवल नादानी‘ चिट्ठी पर भी लिखी थी।

‘अच्छा तो, आपको, क्या केवल यही फायदा हुआ?’

नहीं इसके अलावा एक और फायदा हुआ।

‘अरे, ज्लदी बताईये, रुक क्यों गये।’

मैंने लेख चिट्ठे पर एक चिट्ठी ओपेन सोर्स सॉफ्टवेर के नाम से प्रकाशित की है। इसके बाद इसे हिन्दी वीकिपीडिया पर भी डाला है। एक दिन इस पर एक टिप्पणी आयी,

‘We found this page very useful. Thanks to the Administrator!’

मैंने इस टिप्पणी को तो प्रकाशित कर दिया पर उन्हें इमेल कर के धन्यवाद देते हुऐ पूछा कि आप कौन हैं।

चंदिता जी का जवाब आया कि वे मुम्बई में कॉमेट मीडिया फॉउन्डेशन से हैं। वे लोग ओपेन सोर्स के बारे में एक सम्मेलन कर रहे थे जिसमें उन्होने हिन्दी वीकिपीडिया के बारे में जानकारी दी। (मितुल जी नोट करेंगे)। इसके बाद वहां पर ओपेन सोर्स सॉफ्टवेर के बारे में सूचना को को सम्मेलन में भाग ले रहे लोगों को दिखा रहे थे। उन्होने जब मेरा यह लेख देखा। तो पसन्द आया। इसलिये धन्यवाद के रूप में वह टिप्पणी की। इसके बाद उन्होनें पूछा,

‘क्या आप मुम्बई में रहते हैं? यहां पर, हम आपका भाषण रखना चाहेंगे।’

मैंने जवाब दिया कि मैं मुम्बई में नहीं, पर वहां से बहुत दूर, एक छोटे से कस्बे में रहता हूं। यदि कभी मुम्बई आया, तो बताऊंगा।

देखा न फायदा - मुंबई में भाषण देने का मुफ्त में न्योता मिला। जल्दी से आप भी अपने लेख वीकिपीडिया पर डालना शुरु कीजये और उन्हें कॉपीलेफ्ट कीजये। क्या मालुम दुनिया के किस कोने से बोलने का न्योता मिल जाय :-)

मुझे, अक्सर मुंबई जाना पड़ता है। अब तो, बोलने का न्योता भी मिल गया पर जब से गोवा में भाषण देने का अनुभव हुआ है तबसे समुद्र के किनारे भाषण देने जाने में डर सा लगने लगा :-(

अन्य सांकेतिक चिन्ह

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  1. समीर लाल

    चले जाओ मुमंबई…बार बार मौके नहीं आते…और काम भी उतकृष्ट है..सबका नाम होगा..बधाई, न्यौता तो मिला!! :)

  2. ई-स्वामी

    फ़ायदे और भी हैं!

    मैने हिंदी ट्रांसलिटरेशन टूल्स और बहुभाषी साईट्स पर काम किया है इसका मुझे व्यवसायिक फ़ायदा पहुंचा था - मुझे एक बार एक प्रोजेक्ट पर काम करने का न्योता इसी लिये मिला था की मेरा ऐसे साफ़्टवेयर्स मे रुझान है.

  3. श्रीश शर्मा

    ‘सॉफ्टवेर’ नहीं ‘सॉफ्टवेयर’ लिखा जाना चाहिए। आपकी एक पिछले पोस्ट पर यह बात उठाई गई थी। इंग्लिश के बहुत से शब्दों हेतु गलत वर्तनियाँ प्रचलित हैं। और तो और सबसे प्रसिद्ध शब्द ‘इंटरनेट’ का भी शुद्ध रुप ‘इंटरनैट’ है। इस विषय में कभी लिखने की योजना है।

    विकिपीडिया बहुत अच्छी जगह है, कोई दो राय नहीं। :)

    श्रीष जी
    अंग्रेजी के शब्दो को हिन्दी में लिखने की मुश्किल आती है। मेरे विचार से उन्हें वैसे लिखना चाहिये जैसे वे बोले जाते हों। कुछ लोग coffee को - कोफी कहते हैं, कुछ कौफी, कुछ काफी और कुछ कॉफी - कहते हैं। मैं कॉफी ही ठीक समझता हूं क्योंकि मैं इसे इसी तरह से बोलता हूं। संजय जी ने भी इस बात का जिक्र यहां किया है।
    मैं वह दोनो शब्द जिसका आपने जिक्र किया है उन्हें उसी तरह से बोलता हूं जैसे लिखा है। मैं अंग्रेजी का ज्ञाता नहीं हूं इसलिये नहीं कह सकता कि मेरा उच्चारण सही है कि वह सही जैसे आपने लिखा है। कुछ अखबारों में वैसे ही लिखा जाता है जैसे कि आपने बताया है पर क्या वह उच्चारण सही है? इस मुश्किल का जिक्र मैंने अपनी इस चिट्ठी पर किया है।
    जिस तरह से बोलो उस तरह से लिखो कि बात नामों के साथ नहीं लगती है क्योंकि नाम दूसरे तरह से भी बोले जाते हैं। Vista जब अंग्रेजी शब्द होता है तब विस्टा सही है। जैसेा कि एक बार आपने लिखा था पर जब यह विंडोज़ के नाम की तरह प्रयोग होता है तो यह दोनो तरह से विस्टा या फिर वीस्टा की तरह से बोला जाता है और दोनो तरह से लिखना ठीक है जब तक कि कोई मानक न तय किया गया हो।
    Linux के बारे तो बहुत कुछ गोलमाल है। इसे लीनुक्स, लिनेक्स, लीनेक्स, और लाइनेक्स तरह तरह से बोला जाता है। मालुम नहीं क्या सही है और इसे कैसे लिखा जायगा।
    क्या कोई मानक है और है तो किसने वह मानक तय किया है? क्या वह मानक सही है? क्योंकि, यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि वह शब्दों को किस तरह से उच्चारित करता है :-)
    इस विषय पर आपकी चिट्टी का इंतजार रहेगा। मैं भाषा का जानकार नहीं हूं। मैं और चिट्ठाकार बन्धुवों से भी कहूंगा कि वे इस बारे में अपने विचार रखें। क्या मालुम इसी से हिन्दी चिट्टाजगत में चल रही … बहस से छुटकारा मिले :-)
    उन्मुक्त

  4. श्रीश शर्मा

    श्रीष –> श्रीश

    हाँ यह ठीक कहा आपने बल्कि हम इंग्लिश के शब्दों को हिन्दी में लिखते ही फोनेटिक आधार पर हैं। ‘ओ’ और ‘ऑ’ के उच्चारण और लिखने पर एक पोस्ट लिखूँगा। ऐसा पहले संजय जी की पोस्ट पढ़कर भी कहा था लेकिन भूल गया था, आपने याद दिलाया, धन्यवाद!

    Software का अमेरिकन उच्चारण तो सॉफ्टवेर जैसा ही है जिसमें कि ‘य’ साइलेंट टाइप होता है या होता ही नहीं लेकिन भारत में इसे ‘सॉफ्टवेयर’ ही उच्चारित किया जाता है जिसमें कि ‘य’ शामिल होता है इसीलिए मैं फोनेटिक आधार पर इस तरह लिखने की वकालत करता हूँ।

    अंग्रेजी शब्दों को हिन्दी में लिखने का एकमात्र आधार फोनेटिक ही हो सकता है और कुछ नहीं। अक्सर गलती तब होती है कि लोग फोनेटिक उच्चारण को ट्रांसलिट्रेशन के साथ घाल-मेल कर देते हैं जिसके कारण कई अंग्रेजी शब्दों का लेखन गलत प्रचलित हो गया जिनमें आम तौर पर ‘e’ की गलती रहती है। इस विषय पर जैसा आपने कहा, अपने विचार एक पोस्ट में अलग से लिखूँगा।

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