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    • पुराने रिश्तों में नया-पन, नये रिश्तें बनाने से बेहतर है
      यह चिट्ठी पति पत्नी के रिश्तों के एक पहलू के बारे में है।मैंने पिछली चिट्ठी 'मैं तुमसे प्यार करता हूं कहने के एक तरीका यह भी' में लिखा था कि इन्होंने (उन्मुक्त) मुझसे आज तक यह नहीं कहा कि 'मैं तुमसे प्यार करता हूँ' और मुझे इन शब्दों का इंतजार है। मैंने यह भी लिखा था,'यह मेरा जन्मदिन हमेशा याद रखते हैं पर लगभग दो दशक पहले मेरे जन्मदिन […]
    • बादलों का घर आना और गालों की लाली
      यह चिट्ठी शिलॉंग में हमारे कुछ अनुभवों को बताती है।कुछ दिन पहले अरविन्द भाईसाहब ने एक चिट्टी 'मैं शर्म से हुई लाल ....' लिख कर गालों की लाली के बारे में चर्चा की थी। इसके बाद अभिषेक भइया ने भी 'लाली देखो लाल की...!' चिट्ठी लिख कर कुछ अलग प्रकार के अनुभव के बारे में लिखा। इन चिट्ठियों पर मुझे २५ साल पहले गालों की लाली याद आयी। मैं बहुत दिन […]
    • मैं तुमसे प्यार करता हूं कहने के एक तरीका यह भी
      कुछ समय पहले शास्त्री भाईसाहब ने अपने चिट्ठे 'कच्चे धागे - Building Relations' पर एक चिट्ठी 'मैं तुमसे प्यार करता हूँ!!' नाम से लिखी। वे कहते हैं, 'आपसी स्नेह को प्रगट करना अधिकतर भारतीय पति पत्नी के लिये बहुत मुश्किल है ... इसमें एक बदलाव आना जरूरी है।' इन्होंने (उन्मुक्त) आज तक यह शब्द मुझसे नहीं कहे, मुझे इन शब्दों का इंतजार […]
    • महिला दिवस ८ मार्च को क्यों मनाया जाता है?
      अमेरिका में सोशलिस्ट पार्टी के आवाहन पर, यह दिवस सबसे पहले सबसे पहले यह २८ फरवरी १९०९ में मनाया गया। इसके बाद यह फरवरी के आखरी इतवार के दिन मनाया जाने लगा। १९१० में सोशलिस्ट इंटरनेशनल के कोपेनहेगन के सम्मेलन में इसे अन्तरराष्ट्रीय दर्जा दिया गया। उस समय इसका प्रमुख ध्येय महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिलवाना था क्योंकि, उस समय अधिकर देशों में महिला को वोट दे […]
    • मुझे, जब विंडोज़ विस्टा की याद आयी
      मैं अध्यापिका हूं, गणित पढ़ाती हूं। मुझे काम की जगह से लैपटॉप मिला है। इस पर विंडोज़ विस्टा ऑपरेटिंग सिस्टम था। मैं इसके पहले डेस्कटॉप कंप्यूटर पर काम करती थी, जिस पर फेडोरा है। मुझे लैपटॉप पर काम करने में मुश्किल पड़ी।यह बहुत धीमा चलता था। किसी प्रोग्राम को चलाने के बाद बहुत देर तक इंतजार करना पड़ता था।लिनेक्स से विंडोज़ पर काम करना।यह लैपटॉप मेरा नहीं है, इ […]
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  • Archive for June, 2007

    अंतरजाल की मायानगरी में: टिम बरनर्स् ली

    Posted by उन्मुक्त on June 25, 2007

    इस कड़ी को आप यहां सुन सकते हैं।

     

    ऑर्डर ऑफ मेरिट, इंगलैंड का सबसे महत्वपूर्ण सम्मान है। यह वहां की महारानी द्वारा कला, विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिये दिया जाता है।

    १३ जून २००७: टिम बरनर्स् ली, ऑर्डर ऑफ मेरिट से सम्मानित किये गये। इसके पहले २००१ में, उन्हें रॉयल सोसायटी का सदस्य बनाया गया। २००४ में नाईटहुड की उपाधि दी गयी थी। टाइम पत्रिका ने उन्हें, २०वीं शताब्दी के १०० महान वैज्ञानिकों और विचारकों में चुना है। क्या किया है उन्होने? क्यों दिये गये हैं,उन्हें यह सारे सम्मान?

    उन्हें यह सम्मान, उस कार्य के लिये दिया गया है जिसका हम सब से संबन्ध है – अंतरजाल से। उन्होने वेब तकनीक का अविष्कारक किया है। टिम को ऑर्डर ऑफ मेरिट का सम्मान दिये जाने के उपलक्ष में, मैं एक नयी श्रंखला ‘अंतरजाल की मायानगरी में’ के नाम से शुरू कर रहा हूं। इसे आप मेरे उन्मुक्त चिट्ठे पर पढ़ पायेंगे।

    इस श्रंखला में कई विषयों पर चर्चा रहेगी। हम बात करेंगे,

    • इंटरनेट और वेब इतिहास के बारे में;
    • इन दोनो में क्या अन्तर है;
    • इसके भविष्य के बारे में – इसी में यह भी चर्चा करेंगे कि क्या चिट्ठाकार पत्रकारों की जगह ले लेंगे या फिर रेडियो की या टीवी की। इस तरह की कुछ बात, मैंने अपनी चिट्ठी पत्रकार बनाम चिट्ठाकार में उठायी थी;
    • इंटरनेट पर उठ रहे मुद्दों के बारे में; और
    • मुद्दों के संभावित समाधानों के बारे में – आपके विचारों का हमेशा स्वागत है। खास तौर से, इन समाधानों की चर्चा के समय।

    इसके अतिरिक्त बहुत कुछ और भी होगा इस श्रंखला में, पर यह सब तब शुरू होगा इस समय चल रही तीन श्रंखलाओं (आज की दुर्गा, कशमीर यात्रा, और हमने जानी है जमाने में रमती खुशबू) में से किसी के भी अन्त हो जाने के बाद। जहां तक मैं समझाता हूं कि इनमें सबसे पहले हमने जानी है जमाने में रमती खुशबू ही समाप्त होगी। तब तक इंतजार कीजिये, पर आज कुछ टिम के बारे में।

    टिम का जन्म ८ जून १९५५, इंगलैंड में हुआ था। माता पिता दोनो गणितज्ञ थे। कहा जाता है कि उन्होने टिम को गणित हर जगह, यहां तक कि खाने की मेज पर भी बतायी।

    टिम ने अपनी उच्च शिक्षा क्वीनस् कॉलेज, औक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से पूरी की। विश्वविद्यालय में उन्हें अपने मित्र के साथ हैकिंग करते हुऐ पकड़ लिया गया था। इसलिये उन्हें विश्वविद्यालय कंप्यूटर का प्रयोग करने से मना कर दिया गया :-( १९७६ में, उन्होने विश्विद्यालय से भौतिक शास्त्र में डिग्री प्राप्त की।

    CERN, (सर्न) यूरोपियन देशों की नाभकीय प्रयोगशाला है। १९८४ से, टिम वहीं फेलो के रूप में काम करने लगे। वहां हर तरह के कंप्यूटर थे जिन पर अलग अलग के फॉरमैट पर सूचना रखी जाती थी। टिम का मुख्य काम था कि वे सूचनाये एक कंप्यूटर से दूसरे पर आसानी से जा सकें। उन्हे लगा कि क्या कोई ऐसा तरीका हो सकता है कि सारी सूचनायें,

    • किसी तरह से पिरोयी जा सके, और
    • एक जगह ही प्रकाशित सी लगेंं।

    बस इसी का हल सोचते, सोचते – उन्होंने वेब तकनीक का अविष्कार किया और दुनिया का पहला वेब पेज ६ अगस्त १९९१ को सर्न में बना।

    tim.gif

    लगता है टिम को नाई के पास जाना चाहिये :-)

    टिम ने इस तकनीक का जब आविष्कार किया तब वे सर्न में काम कर रहे थे। यह तकनीक सर्न की बौद्घिक संपदा थी। ३० अप्रैल १९९३ को, टिम के कहने पर सर्न ने इस तकनीक को मुक्त कर दिया। अब इसे दुनिया के लिए न केवल मुफ्त, पर मुक्त रूप से उपलब्ध है। इसके लिए किसी को, कोई भी फीस नहीं देनी पड़ती है। यह निर्णय न केवल महत्वपूर्ण था पर इंटरनेट के शुरुवाती दौर के निर्णयों के अनुरूप था जो हर तकनीक को मुफ्त व मुक्त रूप से उपलब्ध कराने के लिये कटिबद्ध थे। अब तो आप, ओपेन सोर्स दर्शन का महत्व समझ ही गये होंगे :-)

    टिम, बाद में अमेरिका चले गये। १९९४ में उन्होने, मैसाचुसेटस् इंस्टिट्युट ऑफ टेकनॉलोजी में World Wide Web Cosortium (W3C) की स्थापना की। यह वेब के मानकीकरण में कार्यरत है।

    ईंतजार कीजिये, उंमुक्त चिट्ठे पर चल रही श्रंखला के समाप्त होने काः हम तब इस श्रंखला की अगली कड़ी के अन्दर चर्चा करेंगे – इंटरनेट के बारे में, यह क्या होता है, क्या है इसका इतिहास?

    Posted in कानून, जीवनी, सूचना | 4 Comments »

    हिन्दी वीकिपीडिया और कॉपीलेफ्टिंग – फायदा चिट्ठाकारों का

    Posted by उन्मुक्त on June 19, 2007

    क्या हिन्दी वीकिपीडिया पर लेख लिखने और चिट्ठियों को कॉपीलेफ्टिंग करने से कुछ फायदा होता है। जी हां, बहुत कुछ।

    ‘तो भाई, पहले क्यों नहीं बताया। लगता है कि अकेले ही फायदा लेते रहे।’

    चलिये अब बता देता हूं।

    मेरे इस चिट्ठे पर, अन्तरजाल में क्या है, के बारे में मेरी टिप्पणियों के साथ चिट्ठियां रहती हैं।

    उन्मुक्त चिट्ठा, मेरा मुख्य चिट्ठा है। इस पर मेरे विचार रहते हैं पर यह अक्सर कड़ियों में रहते हैं। किसी भी विचार पर लिखने के पहले मे रूप रेखा तो बना लेता हूं पर लेख कड़ियों के साथ ही लिखता हूं – एक साथ बड़ा लेख लिखना मुश्किल रहता है। लेखों को कड़ियों मे लिखने मे आसानी होती है पर पढ़ने मे पूरे लेख ही अच्छे लगते हैं – कारण,

    • दो कड़ियों के बीच अक्सर कुछ और चिठ्ठियां भी आ जातीं है जिससे निरतरता भंग होती है;
    • कड़ियों मे लिखने से तारत्म्यता भी गड़बड़ होती है।

    इससे लगा कि बाद मे सारी कड़ियों को जोड़ कर पूरे विषय पर सामग्री एक जगह कर दिया जाय और यदि उस विषय पर कुछ नया आये तो कड़ियों पर जोड़ने की जगह वहीं पर पर जोड़ा जाय तो ठीक रहेगा तथा उस विषय पर एक जगह पूरी जानकारी भी रहेगी और एक साथ पढ़ने का आनंद ही अलग है। यह कार्य मैं अपने लेख चिट्ठे पर करता हूं। जब मैंने इसे शुरू किया, तब मुझे हिन्दी वीकिपीडिया के बारे में नहीं मालुम था।

    कुछ दिनो बाद मितुल जी ने मेरे लेख चिट्टे पर टिप्पणी कर मुझे हिन्दी वीकिपीडिया पर लिखने की सलाह दी और यह सफर भी मैंने ज्लद ही तय किया। मैंने दो और चिट्ठिया हिन्दी वीकिपीडिया के बारे में यहां और यहां लिखी हैं। मैं लेख पर चिट्ठियां प्रकाशित करने के बाद, यदि वे हिन्दी विकीपीडिया पर डालने लायक हैं तो, वह भी करता हूं।

    मेरे सारे चिट्ठों की चिट्ठयां और पॉडकास्ट (बकबक) कॉपीलेफ्टेड हैं। आपको भी उन्हे वीकिपीडिया पर डालने की तथा उसी तरह से प्रयोग करने की अनुमति है जैसा कि कैफे हिन्दी में किया गया है। मेरे लेख चिट्ठे की, की कुछ चिट्ठियां जो वीकिपीडिया में नहीं हैं वे कैफे हिन्दी में प्रकाशित हैं।

    मेरा उन्मुक्त और छुटपुट चिट्टा सारे हिन्दी फीड एग्रेगेटर पर आते हैं पर लेख चिट्टा नहीं आता। मैंने इसे स्वयं कहीं नहीं रजिस्टर करवाया। इसका कारण यह था कि इसमें कोई नयी बात नहीं रहती है पर वही रहती है जो उन्मुक्त चिट्ठे पर प्रकाशित हो चुकी होती है। मेरे उन्मुक्त चिट्टे पर १७१ चिट्ठियां हैं। इनको १४,००६ बार देखा गया है, अथार्त प्रति चिट्ठी लगभग ८२ बार। मेरे छुटपुट चिट्टे पर (इस चिट्ठी को छोड़ कर) ६८ चिट्ठियां हैं। इनको ५५०६ बार देखा गया है, अथार्त प्रति चिट्ठी ८१ बार। मेरे लेख चिट्टे पर १२ चिट्ठियां हैं, अथार्त इनको १५१७ बार देखा गया है, अथार्त प्रति चिट्ठी १२६ बार।

    इससे यह स्पष्ट होता है कि सबसे ज्यादा बार मेरे लेख चिट्टे की चिट्ठियों को देखा गया है। आप तो यही सोचते होंगे,

    ‘जब यह किसी फीड एग्रेगेटर में आता नहीं है तो लोग कैसे इस पर आते हैं।’

    इस पर लोग हिन्दी वीकिपीडिया, कैफे हिन्दी और सर्च करके आते हैं। हुआ न फायदा हिन्दी वीकिपीडिया पर लेख लिखने का और कॉपीलेफ्टिंग करने का। लोग अपने आप आते हैं पढ़ने के लिये। ऐसे मैंने यह बात, जब कैफे हिन्दी की आलोचना हो रही थी तब, ‘डकैती, चोरी या जोश या केवल नादानी‘ चिट्ठी पर भी लिखी थी।

    ‘अच्छा तो, आपको, क्या केवल यही फायदा हुआ?’

    नहीं इसके अलावा एक और फायदा हुआ।

    ‘अरे, ज्लदी बताईये, रुक क्यों गये।’

    मैंने लेख चिट्ठे पर एक चिट्ठी ओपेन सोर्स सॉफ्टवेर के नाम से प्रकाशित की है। इसके बाद इसे हिन्दी वीकिपीडिया पर भी डाला है। एक दिन इस पर एक टिप्पणी आयी,

    ‘We found this page very useful. Thanks to the Administrator!’

    मैंने इस टिप्पणी को तो प्रकाशित कर दिया पर उन्हें इमेल कर के धन्यवाद देते हुऐ पूछा कि आप कौन हैं।

    चंदिता जी का जवाब आया कि वे मुम्बई में कॉमेट मीडिया फॉउन्डेशन से हैं। वे लोग ओपेन सोर्स के बारे में एक सम्मेलन कर रहे थे जिसमें उन्होने हिन्दी वीकिपीडिया के बारे में जानकारी दी। (मितुल जी नोट करेंगे)। इसके बाद वहां पर ओपेन सोर्स सॉफ्टवेर के बारे में सूचना को को सम्मेलन में भाग ले रहे लोगों को दिखा रहे थे। उन्होने जब मेरा यह लेख देखा। तो पसन्द आया। इसलिये धन्यवाद के रूप में वह टिप्पणी की। इसके बाद उन्होनें पूछा,

    ‘क्या आप मुम्बई में रहते हैं? यहां पर, हम आपका भाषण रखना चाहेंगे।’

    मैंने जवाब दिया कि मैं मुम्बई में नहीं, पर वहां से बहुत दूर, एक छोटे से कस्बे में रहता हूं। यदि कभी मुम्बई आया, तो बताऊंगा।

    देखा न फायदा – मुंबई में भाषण देने का मुफ्त में न्योता मिला। जल्दी से आप भी अपने लेख वीकिपीडिया पर डालना शुरु कीजये और उन्हें कॉपीलेफ्ट कीजये। क्या मालुम दुनिया के किस कोने से बोलने का न्योता मिल जाय :-)

    मुझे, अक्सर मुंबई जाना पड़ता है। अब तो, बोलने का न्योता भी मिल गया पर जब से गोवा में भाषण देने का अनुभव हुआ है तबसे समुद्र के किनारे भाषण देने जाने में डर सा लगने लगा :-(

    अन्य सांकेतिक चिन्ह

    technogy, तकनीकी, सूचना, हिन्दी, विधि/कानून,

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    सोलैरिस: Solaris

    Posted by उन्मुक्त on June 9, 2007

    आप तो यही सोच रहें हैं न कि,

    ‘लगता है कि उन्मुक्त जी, स्टेंस्लॉ लेम के विज्ञान-कल्पित उपन्यास सोलैरिस (Solaris) की बात करने जा रहे हैं।’

     

    स्टेंस्लॉ लेम विज्ञान-कहानी लिखने वाले एक पोलिश लेखक थे। १९६१ में उन्होने सोलैरिस नामक उपन्यास लिखा। इसका अनुवाद पोलिश से पहले फ्रेंच में, फिर फ्रेंच से अंग्रेजी में किया गया। सोलैरिस ग्रह समुद्र से ढ़का है। वहां पर लोगों को उनके अवचेतन मस्तिक्ष में दबे अजीबोगरीब ख्याल उभर कर आने लगते हैं। उनकी समझ में यह नहीं आता है कि यह क्यों हो रहा है। यह कहानी एक दूसरे से सम्पर्क करने के तरीकों के बारे में है। यह विज्ञान की कल्पित कहानियों की उच्च कोटि की कृतियों में गिनी जाती है। पर आप गलत सोच रहें हैं – मैं इसके बारे में बात नहीं करना चाहता हूं।

    ‘अच्छा तो उन्मुक्त जी आप आईसेक ऐसिमोव के उपन्यास द नेकेड सन (The Naked Sun) के बारे में बात करना चाहते हैं। जिसके वर्णित ग्रह के लोगों की तरह आप हैं। यह तो आपने ही रचना जी के पहले और तीसरे सवाल के जवाब पर एक अनमोल तोहफ़ा चिट्ठी पर बताया है।
    उन्मुक्त जी आप गलत फहमी में जी रहें हैं क्योंकि उसमें ग्रह का नाम सोलैरिआ (Solaria) है न कि सोलैरिस और रहने वाले सोलैरिएन (solarian) हैं।’

    ‘द नेकेड सन’ में सोलैरिआ ग्रह के लोग कुछ अजीब हैं। वे किसी से मिलना पसन्द नहीं करते। वहां २०० साल में पहली हत्या होती है। उन्हें नहीं मालुम कि इसका हल कैसे निकाला जाय। वे पृथ्वी के लोगों से सहायता मांगते हैं। पृथ्वीवासी, एक जासूस एलिज़ा बेली को इस हत्या का हल ढ़ूढ़ने के लिये भेजते हैं। इस जासूस को पृथ्वीवासियों के लिये भी जासूसी करनी है जो कि सोलैरिएन को नहीं बताया गया है और गोपनीय है। यह ऐसीमोव के रोबोट सीरीस की कहानी है। इस कहानी के रोबोटों ने फॉउंडेशन सिरीस के उपन्यासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। ऊंह हूं ऊऊऊं, मैं इसके बारे में भी बात नहीं करना चाहता।

    ‘आप बड़े अजीब किस्म के इन्सान हैं। आप क्या बताना चाहते हैं? मुद्दे पर आइये। इतनी देर क्यों लगाते हैं?’

    मैं तो सोलैरिस ऑपरेटिंग सिस्टम के बारे में बात करना चाहता हूं। क्या करूं, आप लोग ही तरह तरह की कहानियों के बारे में बात करने लगे। चलिये मुझे उनके बारे में पता नहीं था, अब चल गया। मुद्दे की बात पर आते हैं।

    आपरेटिंग सिस्टम वह सॉफ़्टवेयर होता है जो किसी कंप्यूटर को चलाता है और उसके हार्डवेयर के बीच समंव्य लाता है। यह मुख्यत: तीन तरह के होते हैंः

    1. यूनिक्स की तरह के:
    2. मैक/ औ.एक्स. की तरह के: परसनल कं‍प्यूटर की शुरूआत इन्हीं से हुई थी तथा चलाने में यह सबसे आसान हैं। अपने देश में तो नहीं, पर बाहर के देशों में ज्यादा लोकप्रिय है। बरक्ले यूनिक्स, यूनिक्स का ही रूप है। मैक सिस्टम में बरक्ले यूनिक्स का काफी योगदान है।
    3. विन्डोज़ की तरह के: यह दुनिया में सबसे ज्यादा लोकप्रिय है।

    मैंने इनके बारे में यहां विस्तार से लिखा है।

    लिनेक्स, सोलैरिस दोनो यूनिक्स से निकले हैं और ये इसी के रूप हैं। सोलरिस सन माईक्रो-सिस्टम की देन है। सन माईक्रो-सिस्टम कंप्यूटर की जानी मानी कंपनी है। सोलरिस के अलावा स्टार ऑफिस और जावा इसी की देन हैं। अगस्त २००६ बैंगलोर में, सन माईक्रो-सिस्टम की एक अन्तरराष्ट्रीय बैठक हुई थी। यह मुख्यतः इस लिये थी की भारत के लोगों की सहायता से इसके काम को आगे बढ़ाया जाय। इसमें काफी कुछ प्रगति हुई है। इस कंपनी का ओपेन सोर्स से काफी पहले से संबन्ध है। ओपेन ऑफिस डाट ऑर्ग मुख्यतः स्टार ऑफिस के सोर्स कोड से बना है। पिछले साल अगस्त में बैंगलोर में हुऐ सम्मेलन के समय यह कंपनी जावा को औपेन सोर्स करने के लिये कुछ ढ़ुलमुल थी पर वहां हुऐ सम्मेलन में हुई बहस के बात यह संशय समाप्त हो गयी। इस समय जावा भी ओपेन सोर्स है।

    सोलैरिस पहले मालिकाना थी पर अब ओपेन सोर्स हो गयी है। आप ओपेन सोर्स सोलैरिस-१० यहां से डाउनलोड कर सकते हैं। यह पहले स्पार्क (SPARC ) आधरित प्रोसेसर पर चलती थी जिसे केवल सन माईक्रो-सिस्टम ही बनाता था। इस पर और ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं चल पाते थे। सोलरिस, अब x64/x86 प्रोसेसर पर भी चलती है यानि कि यह इंटेल या फिर ए.एम.डी. के बनाये चिप पर भी चलेगी। दूसरे अर्थों में यह उन कंप्यूटर पर भी चल सकेगी, जिस पर विंडोज़ चलती है :-)

    मैं तकनीक से जुड़ा व्यक्ति नहीं हूं पर तकनीक से जुड़े लोगों का कहना है कि यह लिनेक्स से भी अच्छा और स्थायी ऑपरेटिंग सिस्टम है। यहां पर यह बताने की जरूरत नहीं कि यह तकनीक से जुड़े सारे लोग मानते हैं कि लिनेक्स विंडोज़ से ज्यादा स्थायी ऑपरेटिंग सिस्टम है।

    सोलैरिस पर ओपेन ऑफिस डॉट ऑर्ग के सारे प्रोग्राम, थंडरबर्ड, फायरफॉक्स के प्रोग्राम उसी तरह से चलते हैं जैसे कि वे लिनेक्स या फिर विंडोज़ पर चलते हैं। इसके अतिरिक्त, चूंकि सोलैरिस भी यूनिक्स पर आधारित है इसलिये, इस पर वे सब प्रोग्राम चल सकते हैं जो कि लिनेक्स पर चलते हैं।
    यदी आप सोलैरिस को अपने कंप्यूटर में स्थापित करने की बात सोचते हों तो इस ट्यूटोरियल को भी देखें पर तभी यदि आप तकनीक में रुचि रखते हों।

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