१९६० दशक के पहले भाग में, मेरा स्कूली जीवन बीता। उसी समय To Sir with Love नामक पुस्तक पढ़ी थी। यह पुस्तक ई.आर. ब्रेथवेट ने लिखी है। बाद में इसके ऊपर एक पिक्चर भी बनी। वह भी तभी देखी। यह एक अश्वेत अध्यापक की कहानी है जो कि लंदन के उदण्ड विद्यार्थियों के स्कूल में पढ़ाने जाता है। इस स्कूल में अधिकतर बच्चे श्वेत हैं। यह अश्वेत अध्यापक, इन बच्चों को कैसे ठीक करता है, कैसे वह उनके दिल के करीब पहुंच जाता है, वह एक साल के लिये आया था पर एक साल बाद क्या करता है। बस यही है, इस कहानी में। सिडनी पॉएटर ने पिक्चर में अध्यापक का रोल अदा किया है। यह पुस्तक और पिक्चर दोनो बहुत अच्छी हैं। वह उम्र ही ऐसी होती है जब हम अपने अध्यापक या अध्यापिकाओं को हीरो की तरह देखते हैं। यदि पुस्तक नहीं पढ़ी या पिक्चर नहीं देखी, तो अवश्य पढ़ें और देखें, पसंद आयेगी।
मैं तो यही समझता था कि मैंने पढ़ाई छोड़ी और मास्टरों और मास्टरनियों की दुनिया से छुट्ठी मिली, पर कहां मिली। मुझे तो मिल गयीं मुन्ने की मां, पढाती हैं और घर में भी … बताऊंंगा नहीं, उसने पढ़ लिये तो शामत ही आ जायगी। मैंने मुन्ने की मां को छोड़ कर, अंतरजाल में मन लगाया। जुम्मा, जुम्मा कुछ महीने हुए कि यहां भी मास्टर जी और मास्टरनी जी आ गयीं - लगे छड़ी घुमाने और होम वर्क देने। चिट्ठेकार पकड़े जाने लगे होम वर्क के लिये - पांच सवाल का जवाब दो। मैं तो दो बार यहां और यहां पकड़ा गया। जवाब तो देना पड़ा
मेरे जवाब एक अनमोल तोहफ़ा और बनेगे हम सुकरात या फिर हो जायेंगे नील कण्ठ की चिट्ठी पर पढ़े जा सकते हैं।
सवाल भी कैसे, एक से एक कठिन। मैंने आपत्ति की,
‘यह तो बहुत मुश्किल सवाल हैं। मैं कॉपी करके लिखूंगा।’
मुझे तुरन्त बताया गया,
‘जवाब … कॉपी किये हुए नही चलेंगे। No cheating.’
और डांटा गया, अलग से,
‘मै नही मानती कि मेरे सवाल कठिन थे … आप जैसे लोग … सरल बातों को भी कठिन बना लेते हैं। … आपने हमारे लिये …कठिनाई पैदा कर दी है।’
क्या कहने। उलटा चोर कोतवाल को डांटे।
अब आप इन दो सवालों को देखिये फिर बताईये कि यह आसान हैं कि मुश्किल। यह सवाल कुछ सरल भाषा में इस तरह से हैं।
- आपको किसी दूसरे चिट्टेकार की लिखी हुई कौन सी पोस्ट पसन्द है?
- आप किस साथी चिट्ठाकार से मिलना चाहते हैं?
नानी याद आ गयी, पसीने छूट गये जवाब लिखने में।
अब आप बताइये कि
- सच लिखा जाय, या
- झूट लिखा जाय, या फिर
- इस सवाल के जवाब को छोड़ दिया जाय।
मजे की बात देखिये यह सवाल कई मास्टर और मास्टरनी जी पूछ रहें हैं।
कईयों ने यह दो सवाल न पूछ कर, सवाल बदल दिये। मैंने भी ऐसा किया था। जिन बेचारों को इन सवालों का जवाब देना पड़ा यदि उनका जवाब पढ़ें, तो यह उनके बारे में न केवल सबसे ज्यादा बताते हैं पर उनकी लेखन कला की परिपक्वत्ता को भी भी चुनौती देते हैं।
यदि आपने इन दोनो सवालों का जवाब नहीं दिया तो सोच कर देखिये की सार्वजनिक रूप में किस प्रकार उत्तर देगें।
सच यह कि मैं यह दो सवाल किसी से न पूंछना चाहूं। अपने मित्र से इसलिये नही कि यदि वह अच्छी तरह से जवाब न दे पाया तो …। अपने दुशमन से इस लिये नहीं, कि यदी उसने बाखूबी से उत्तर दे दिया तो फिर तो उसकी तो धाक जम जायगी।
मुन्ने की मां मुझे बताती है कि अमेरिका में साल के अन्त में विद्यार्थी अपने टीचरों के बारे में अपना मत देते हैं। यह अपने देश में आई आईटी कानपुर में भी होता है, शायद इसलिये कि यह अमेरिकी पैटर्न पर उन्हीं की सहायता से बनी है। यह शायद अपने देश में और कहीं नहीं होता है। क्या पांच सवाल खेल के नियम बदल दिये जांय। जिन जिन मास्टर और मास्टरनी जी ने यह दो सवाल पूछें है और स्वयं इसका जवाब नहीं दिया है तो क्या उनसे यह दो सवाल पूछें जाया।
अन्तरजाल पर सारे मास्टर जी और मास्टरनी जियां काबिल हैं। आज भी, मुझे तो वे सब किसी हीरो या हीरोइन से कम नहीं लगती - बाखूबी से जवाब मिलेगा पर फिर भी …। मैं तो भारत का पढ़ा हूं, न कभी बाहर पढ़ाने का मौका मिला है - अमेरिकन सिस्टम तो मेरे पल्ले नहीं पड़ता।
March 27, 2007 at 1:31 pm
To Sir With Love वाकई बहुत ही अच्छी किताब है।
सबसे अच्छी बात इस किताब की यह लगी कि यह स्वयं और दूसरों के पूर्वाग्रहों को चुनौती देती हैं…और उन्हे गलत साबित भी करती है…..दिल को छूने में सक्षम…यह किताब प्रेरणा का स्रोत है……..
March 27, 2007 at 3:36 pm
अच्छे विषय वस्तु का कबाड़ा नहीं करना चाहता था, मगर आपने जो बात कही की हम शिक्षको में हिरो देखते है, एकदम सही कहा. शिक्षक के साथ विद्यार्थिनीयों के भागने के पीछे भी यही कारण है.
March 28, 2007 at 7:34 am
बहुत अच्छे। सवाल वाकई काफ़ी कठिन हैं। मास्टरजी/मास्टरनी जी सख्त है!
March 28, 2007 at 10:53 am
टू सर … बहुत अच्छी किताब है । प्रेरणा देने वाली
March 28, 2007 at 6:34 pm
unmuktji
aapki rachan dekhee. achcee lagee.
mere vichar se aap pemplet badlen to acchha
lagega
March 28, 2007 at 10:26 pm
मुझे जरा भी अन्दाजा होता कि प्रश्न पत्र सब लोग इतना मन लगा कर हल करेंगे तो मै भी अपना होमवर्क ठीक से करके प्रश्न पूछती… वो किताब मै जरूर पढूँगी.