छुट-पुट

उन्मुक्त पर मेरे विचार, छुट-पुट पर इधर उधर

Archive for March, 2007

पत्रकार बनाम चिट्ठाकार

Posted by उन्मुक्त on March 28, 2007

कुछ दिन पहले, हिन्दी चिट्ठाजगत में पत्रकार और चिट्ठाकार के सम्बन्ध में बहस शुरू हुई। शायद यह भी अनुमान लगाया गया कि पत्रकार, चिट्ठाकार क्यों बने। शायद कुछ नये सिद्धान्त भी प्रतिपादित किये गये। यह बहस शायद अभी भी हिन्दी चिट्टाजगत में चल रही है।

मैं ‘शायद’ शब्द का, इसलिये प्रयोग कर रहा हूं क्योंकि मैंने इस विषय पर, एक या दो पोस्ट पढ़ कर, पोस्टें पढ़ना छोड़ दिया। मेरे विचार से, सबको अपनी बात कहने का, चिट्टाकार बनने का अधिकार है।

चिट्टाकारिता करने का अधिकार, उसी तरह से है जैसे कि हिन्दी चिट्ठों की नयी प्रविष्टियां बताने वाली वेबसाइट (जैसे कि नारद, या HindiBlog.com, या हिन्दी चिट्टे एवं पॉडकास्ट) के प्रबन्धतंत्र को अधिकार है कि वे किस चिट्टे की प्रविष्टियां प्रकाशित करें और किसकी नहीं। यदि वे किसी चिट्ठे की प्रविष्टियां अनुपयुक्त पाते हैं तो वे उसे हटा सकते हैं। यदि कोई समझता है कि वे गलत कर रहें हैं तो वह स्वयं उस तरह की दूसरी सेवा शुरू कर सकता है। हमें उनके निर्णय को स्वीकारना होगा। यह अलग बात है कि उनके फैसले के आधार पर, उनकी विश्वसनीयता या निष्पक्षता आंकी जा सकती है।

पत्रकार और चिट्ठाकार के सम्बन्धों के बारे में न केवल हिन्दी चिट्ठाजगत पर अंग्रेजी चिट्ठाजगत पर भी बहस चल रही है। हांलाकि इसका स्वरूप, कुछ भिन्न है।

अंग्रेजी चिट्ठेकार यह कह रहें हैं कि उन्हें भी वही मान्यता और अधिकार मिलने चाहिये जो कि पत्रकारों को मिलते हैं।

पत्रकार कह रहें है कि,

  • चिट्ठेकार न तो पत्रकारों की श्रेणी में हैं;
  • न ही वे पत्रकारों जैसी मान्यता अथवा सुविधायें के अधिकारी हैं;
  • न ही उन्हें चिट्ठेकारों को वे सुविधायें मिलनी चाहिये, जो कि पत्रकारों को मिलती हैं।

आप क्या सोचते हैं? आपको क्या लगता है? क्या चिट्टाकार की श्रेणी पत्रकार से कम है? क्या चिट्टाकार को वह सारी मान्यता तथा अधिकार मिलने चाहिये जो कि पत्रकार को मिलते हैं?

नोट: मैं माफी चाहूंगा। भूलवश, अपनी बात इस चिट्ठी में ठीक से नहीं कह पाया। मैंने इसे अविनाश जी की टिप्पणी के संदर्भ में उनकी टिप्पणी के नीचे स्पष्ट किया है। कृपया इस चिट्ठी को मेरे स्पष्टीकरण के साथ पढ़ें। उससे मेरी मंशा स्पष्ट होगी।

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मास्टर और मास्टरनियों को मेरा सलाम

Posted by उन्मुक्त on March 27, 2007

१९६० दशक के पहले भाग में, मेरा स्कूली जीवन बीता। उसी समय To Sir with Love नामक पुस्तक पढ़ी थी। यह पुस्तक ई.आर. ब्रेथवेट ने लिखी है। बाद में इसके ऊपर एक पिक्चर भी बनी। वह भी तभी देखी। यह एक अश्वेत अध्यापक की कहानी है जो कि लंदन के उदण्ड विद्यार्थियों के स्कूल में पढ़ाने जाता है। इस स्कूल में अधिकतर बच्चे श्वेत हैं। यह अश्वेत अध्यापक, इन बच्चों को कैसे ठीक करता है, कैसे वह उनके दिल के करीब पहुंच जाता है, वह एक साल के लिये आया था पर एक साल बाद क्या करता है। बस यही है, इस कहानी में। सिडनी पॉएटर ने पिक्चर में अध्यापक का रोल अदा किया है। यह पुस्तक और पिक्चर दोनो बहुत अच्छी हैं। वह उम्र ही ऐसी होती है जब हम अपने अध्यापक या अध्यापिकाओं को हीरो की तरह देखते हैं। यदि पुस्तक नहीं पढ़ी या पिक्चर नहीं देखी, तो अवश्य पढ़ें और देखें, पसंद आयेगी।

मैं तो यही समझता था कि मैंने पढ़ाई छोड़ी और मास्टरों और मास्टरनियों की दुनिया से छुट्ठी मिली, पर कहां मिली। मुझे तो मिल गयीं मुन्ने की मां, पढाती हैं और घर में भी … बताऊंंगा नहीं, उसने पढ़ लिये तो शामत ही आ जायगी। मैंने मुन्ने की मां को छोड़ कर, अंतरजाल में मन लगाया। जुम्मा, जुम्मा कुछ महीने हुए कि यहां भी मास्टर जी और मास्टरनी जी आ गयीं – लगे छड़ी घुमाने और होम वर्क देने। चिट्ठेकार पकड़े जाने लगे होम वर्क के लिये – पांच सवाल का जवाब दो। मैं तो दो बार यहां और यहां पकड़ा गया। जवाब तो देना पड़ा :-( मेरे जवाब एक अनमोल तोहफ़ा और बनेगे हम सुकरात या फिर हो जायेंगे नील कण्ठ की चिट्ठी पर पढ़े जा सकते हैं।

सवाल भी कैसे, एक से एक कठिन। मैंने आपत्ति की,

‘यह तो बहुत मुश्किल सवाल हैं। मैं कॉपी करके लिखूंगा।’

मुझे तुरन्त बताया गया,

‘जवाब … कॉपी किये हुए नही चलेंगे। No cheating.’

और डांटा गया, अलग से,

‘मै नही मानती कि मेरे सवाल कठिन थे … आप जैसे लोग … सरल बातों को भी कठिन बना लेते हैं। … आपने हमारे लिये …कठिनाई पैदा कर दी है।’

क्या कहने। उलटा चोर कोतवाल को डांटे।

अब आप इन दो सवालों को देखिये फिर बताईये कि यह आसान हैं कि मुश्किल। यह सवाल कुछ सरल भाषा में इस तरह से हैं।

  • आपको किसी दूसरे चिट्टेकार की लिखी हुई कौन सी पोस्ट पसन्द है?
  • आप किस साथी चिट्ठाकार से मिलना चाहते हैं?

नानी याद आ गयी, पसीने छूट गये जवाब लिखने में।

अब आप बताइये कि

  • सच लिखा जाय, या
  • झूट लिखा जाय, या फिर
  • इस सवाल के जवाब को छोड़ दिया जाय।

मजे की बात देखिये यह सवाल कई मास्टर और मास्टरनी जी पूछ रहें हैं।

कईयों ने यह दो सवाल न पूछ कर, सवाल बदल दिये। मैंने भी ऐसा किया था। जिन बेचारों को इन सवालों का जवाब देना पड़ा यदि उनका जवाब पढ़ें, तो यह उनके बारे में न केवल सबसे ज्यादा बताते हैं पर उनकी लेखन कला की परिपक्वत्ता को भी भी चुनौती देते हैं।

यदि आपने इन दोनो सवालों का जवाब नहीं दिया तो सोच कर देखिये की सार्वजनिक रूप में किस प्रकार उत्तर देगें।

सच यह कि मैं यह दो सवाल किसी से न पूंछना चाहूं। अपने मित्र से इसलिये नही कि यदि वह अच्छी तरह से जवाब न दे पाया तो …। अपने दुशमन से इस लिये नहीं, कि यदी उसने बाखूबी से उत्तर दे दिया तो फिर तो उसकी तो धाक जम जायगी।

मुन्ने की मां मुझे बताती है कि अमेरिका में साल के अन्त में विद्यार्थी अपने टीचरों के बारे में अपना मत देते हैं। यह अपने देश में आई आईटी कानपुर में भी होता है, शायद इसलिये कि यह अमेरिकी पैटर्न पर उन्हीं की सहायता से बनी है। यह शायद अपने देश में और कहीं नहीं होता है। क्या पांच सवाल खेल के नियम बदल दिये जांय। जिन जिन मास्टर और मास्टरनी जी ने यह दो सवाल पूछें है और स्वयं इसका जवाब नहीं दिया है तो क्या उनसे यह दो सवाल पूछें जाया।

अन्तरजाल पर सारे मास्टर जी और मास्टरनी जियां काबिल हैं। आज भी, मुझे तो वे सब किसी हीरो या हीरोइन से कम नहीं लगती – बाखूबी से जवाब मिलेगा पर फिर भी …। मैं तो भारत का पढ़ा हूं, न कभी बाहर पढ़ाने का मौका मिला है – अमेरिकन सिस्टम तो मेरे पल्ले नहीं पड़ता।

सांकेतिक चिन्ह

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एक नया प्रयोग

Posted by उन्मुक्त on March 23, 2007

कुछ दिन पहले, रवी जी ने अरुणा ठाकुर को भेजी गयी ईमेल की कॉपी मुझे भेजी। इसमें लिखा था कि

‘Oh!, I just missed Unmukt. He is an active podcaster. He can brief you about Podcast in detail.’

इसके बाद मेरी अरुणा जी से ईमेल पर बात हुई। आप दिल्ली के एक महाविद्यालय में जर्नलिज़म और मास कम्यूनिकेशन विभाग में अध्यापिका हैं और प्रो. अशोक चक्रधर के साथ जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में ‘हिन्दी साइबर पत्रकारिता की प्रकृति और इसके आयाम’ पर शोध कर रहीं हैं। वे इसी के संबन्ध में पॉडकास्ट से जुड़ी सूचना चाहती थी।

अरुणा जी देश की राजधानी दिल्ली में रहती हैं और मैं भारत के एक कोने में, एक छोटे से कसबे में। यह सूचना पॉडकास्ट से जुड़ी है इसीलिये हमने पॉडकास्ट के द्वारा एक नया प्रयोग करने की सोची। वे ईमेल द्वारा सवाल पूछेंगी और मैं पॉडकास्ट के द्वारा उनका जवाब दूंगा। इसके कई फायदे हैं।

  • इस तरह से हम सब इस प्रयोग में योगदान कर सकते हैं। आप मेरी गलती को टिप्पणी द्वारा ठीक कर या अपने चिट्टे पर लिख कर अरुणा जी के शोध कार्य में सहायता कर सकते हैं। ऐसे मैं तो चाहूंगा कि आप मेरे चिट्ठे पर ही टिप्पणी करें – कम से कम कुछ टिप्पणी तो आयेगी :-) ;
  • इस समय हिन्दी पॉडकास्टिंग नहीं के बराबर है। हो सकता है कि आपको भी पॉडकास्टिंग का जोश आ जाये और यह संख्या बढ़ जाय। सागर जी चिट्ठाचर्चा में यहां पॉडकास्टिंग के बारे में बता रहें हैं और कुछ भविष्यवाणियां भी कर रहें हैं। आने वाले पॉडकास्ट में, इन सब भविष्यवाणियां पर भी चर्चा करेंगे।

अरुणा जी का पहला सवाल है,

‘क्या आप हिन्दी के पहले पॉडकास्टर हैं और आपने कब, तथा क्यों पॉडकास्टिंग करनी शुरू की?’

इसका जवाब आप मेरे बकबक चिट्ठे पर यहां सुन सकते हैं। अरुणा जी के सवालों के जवाब के पॉडकास्ट की सूचना, मेरे इसी छुटपुट चिट्ठे पर आयगी। ऐसे हिन्दी की नवीनतम पॉडकास्ट तथा की नवीनतम हिन्दी चिट्ठों की चिट्ठियों की सूचना हिन्दी चिट्ठे एवं पॉडकास्ट Beta पर आती है। इसकी RSS फीड भी है। इसे आप अपने कंप्यूटर में स्थापित कर सकते हैं या फिर इस वेबसाइट पर जा कर देख सकते हैं।

हिन्दी में पॉडकास्ट के इतिहास बारे में गूगल चिट्ठाकार समूह की यह कड़ी महत्वपूर्ण है। मैंने बकबक पॉडकास्ट क्यों शुरू किया और अलग, अलग औपरेटिंग सिस्टम पर कौन कौन से text to sppech प्रोग्राम हैं इन सब की सूचना यहां है। मेरा पहला पॉडकास्ट ८ जुलाई २००६ को था और यह अठ्ठारवां पॉडकास्ट है – यानि कि दो पॉडकास्ट प्रति माह।

अरुणा जी, हम सब आपके अगले सवाल के इन्तजार में हैं।

बकबक चिट्ठे की सारी ऑडियो क्लिपें, ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप,

  • Windows पर कम से कम Audacity एवं Winamp में;
  • Linux पर लगभग सभी प्रोग्रामो में; और
  • Mac-OX पर कम से कम Audacity में,

सुन सकते हैं। मैंने इसे ogg फॉरमैट क्यों रखा है यह जानने के लिये आप मेरी शून्य, जीरो, और बूरबाकी की चिट्ठी पर पढ़ सकते हैं। बकबक की सारी ऑडियो क्लिपें भी बाकी चिट्ठों की तरह कॉपीलेफ्टेड हैं। आपको इनका प्रयोग व संशोधन करने की स्वतंत्रता है। मुझे प्रसन्नता होगी यदि आप ऐसा करते समय इसका श्रेय मुझे (यानि कि उन्मुक्त को), या इस पॉडकास्ट को दें और अच्छा हो कि उस पोस्ट से लिंक दे दें। मुझे और भी प्रसन्नता होगी यदि इनका उपयोग ऐसे लोगों के लिये किया जा सके, जिनकी आखें कमज़ोर हैं।

अन्य चिट्ठों पर क्या नया है इसे आप दाहिने तरफ साईड बार में, या नीचे देख सकते हैं।

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वर्ड प्रेस डाट कॉम के चिट्ठे पर फॉन्ट का आकार कैसे बढ़ांये

Posted by उन्मुक्त on March 20, 2007

मैं वर्ड प्रेस दो चिट्ठे छुट-पुट और लेख लिखता हूं। छुट-पुट पर छुटपुट बातें रहती हैं इसलिये मैं चाहता था कि मैं ऐसी थीम का चयन करूं जिसके कॉलम की चौड़ाई कम हो। एक नयी थीम Fjords04 आयी। यह चार कॉलम में है और इसलिये हर में कॉलम की चौड़ाई कम है। यह थीम मेरे इस चिट्ठे के लिये उपयुक्त है। मैंने इसे प्रयोग कर अज्ञात चिट्ठेकारों की खैर नहीं नामक चिट्टी पोस्ट की। इस पर टिप्पणियां आयीं की फॉन्ट का आकार छोटा है इसको बड़ा करू।

मेरी समझ में नहीं आया कि यह मैं कैसे करूं। मैंने अपनी यह मुश्किल गूगल हिन्दी समूह चिट्टाकार में रखी। इसके बारे में चर्चा यहां देख सकते हैं। इसमे सबसे अच्छा हल जगदीश भटिया जी ने बताया है। इसके लिये आपको चिट्टी की शुरूवात में कोड मोड पर जा कर <font size =”3″> का टैग लगाना है और अन्त में इसे </font> के टैग से बन्द कर देना है। है न कितना आसान। मैंने कुछ और चिट्ठियों के फॉन्ट का आकार बड़ा कर दिया पर अधिकतर का आकार वैसे ही है। आप उन चिट्ठियों को देख कर पहले के आकार का अन्दाज लगा सकते हैं।

इससे यह भी पता चलता है कि हिन्दी चर्चा समूहों का कितना फायदा है और हम एक दूसरी की कितनी जलदी सहायता करते हैं।

यदि मुन्ने की मां के साथ जापान की यात्रा करना चाहें तो उसकी सायोनारा… जापान चिट्ठी यहां पढ़ सकते हैं।

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अज्ञात चिट्ठेकारों की खैर नहीं

Posted by उन्मुक्त on March 5, 2007

इस समय दुनिया का सबसे चर्चित मुकदमा लिनेक्स से सम्बन्धित है। इसमें शक नहीं कि इस मुकदमे का फैसला सूचना प्रद्योकिकी की दिशा बदल देगा। इसके बारे में मैंने विस्तार से चर्चा लिनेक्स की कहानी लिखते समय की है। यह मुकदमा सैंटा क्रुस़ ऑपरेशन (एससीओ) और आईबीएम के बीच है। इस मुकदमे के शुरु होते समय ग्रॉक लॉ नाम की एक वेबसाईट शुरु हुई। इसकी प्रमुख लेखिका सुश्री पॉला जोनस् हैं। यह पैरा लीगल हैं वे इस मुकदमे के हर कदम पर दुनिया को सूचना देती रहती हैं। पर इस सूचना पर हमेशा आईबीएम का ही पहलू रहता है। इसलिये कुछ लोग कहते थे कि वे आईबीएम की तरफ से ही यह चिट्ठा लिख रही हैं।

एससीओ ने न्यायालय के समक्ष आवेदन पत्र दे कर इनहें गवाही देने के लिये सम्मन भिजवाया है। लेकिन यह सम्मन इन पर तामील नहीं हो पाया। वे घर पर नहीं मिली और गॉक लॉ से, कुछ महीने के लिये बिमारी के कारण छुट्ठी ले रखी है।

क्या वे कोई वास्तविक महिला हैं या फिर कोई कल्पना का नाम, क्या मालुम। कुछ इसके बारे में विस्तार से पढ़ना चाहें तो वह यहां, यहां, और यहां है।
अब अज्ञात चिट्ठेकारों की खैर नहीं – कहां जाओगे बच्चू।

मैं! मैं तो हिन्दुस्तान के हर कस्बे में रहने वाला एक आम व्यक्ति हूं। मेरे जैसे तो हर गली में मिल जाते हैं।

सच?

जी हां, बिलकुल सच, खास तो यहां पाये जाते है :-)

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