Posted by उन्मुक्त on October 30, 2006
कुछ दिन पहले जब मैंने यह खबर पढ़ी कि Where in the world does open source come from? तो दिल बैठ गया। इसमें अपना देश कहीं नहीं है। खैर है कि, यह खबर ओपेन सोर्स बेचने वालों की है न कि इस बात कि ओपेन सोर्स कहां बनाया जा रहा है। कुछ दिन पुनः पढ़ा Open source location update। यह पोस्ट बता रही है कि कहां,
- ओपेन सोर्स पनप रहा है;
- इस पर काम हो रहा है।
इसे पढ़ा, तो जान में जान आयी। इसमें अपना देश है। यह बताती है कि Open BSD को छोड़ कर और सब तरह के ओपेन सोर्स पर अपने यहां काम हो रहा है। हांलाकि यह सब दक्षिण भारत में है, उत्तर भारत में नहीं। क्या इस बारे में उत्तर भारत पिछड़ रहा है?
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Posted by उन्मुक्त on October 25, 2006
रेड हैट वालों के लिये ज़ॉड, हमारे लिये फेडोर-६। यह डाउनलोड के लिये, २४ अक्टूबर से उपलब्ध हो गयाा। यदि आपको यह लगता है कि किसी को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं होगी तो आप गलत हैं। पहले ५ घंटों मे १०,००० डाउनलोड हुऐ। यानि कि १.८ सेकन्ड में एक। इसकी साईज़ ३.४ जी.बी. है। अब सर्वर का हाल हुआ होगा यह तो आप सोच ही सकते होंगे।
नहीं सोच सकते – उहं हूं … रो गया और क्या।
इसमें है क्या ऐसा, यह तो रवी रतलाम जी ही बतायेंगे – मेरे से तो यह ऊपर की बात है।
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Posted by उन्मुक्त on October 21, 2006
ऐल्क्से वेय्नर येल विश्विद्यालय के छात्र हैं। उन्होने स्विस बैंक, UBS के पास नौकरी के लिये अपना रेज़ुमे, एक विडियो के साथ भेजा। बहुत ज्लद ही, यह चिट्ठे पर आ गया और फिर YouTube पर। यह इतना लोकप्रिय हो गया कि न्यू-यॉर्क टाईम्स को इस पर लेख लिखना पड़ गया। ऐल्क्से इस विडियो के कारण मिले यश से इतने परेशान हो गये कि फॉक्स टीवी वालों को बताया कि वे बैंक पर मुकदमा ठोकने वाले हैं – पर है क्या इस विडियो में। इसका नाम है, ‘IMPOSSIBLE IS NOTHING‘ मैं तो कभी इस तरह का रेज़ुमे देखा नहीं। आप खुद देख लीजये।
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Posted by उन्मुक्त on October 18, 2006
मैने कुछ दिन पहले अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर ‘आर.एस.एस. फीड (RSS Feed) क्या बला है?‘ नाम की पोस्ट की थी। इसमें आर.एस.एस. तथा ऐटम फीड के बारे में चर्चा की थी। इस चिट्ठी में कुछ फीड पढ़ने के प्रोग्रामों के बारे में भी लिखा था। इसमें गूगल रीडर के बारे में कुछ नहीं बताया था। गूगल, ‘गूगल रीडर’ नाम का नया प्रोग्राम लाया है। इसमें आर.एस.एस. तथा ऐटम फीड दोनो अच्छे चल रहें हैं। यह फीड पढ़ने के लिये गूगल के ‘मेरा खाता’ से बेहतर प्रोग्राम है। इसके लिये आपके पास गूगल की ई-मेल होनी चाहिये। फीड पढ़ने का यह भी अच्छा प्रोग्राम है। आप भी यहां देखिये।
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Posted by उन्मुक्त on October 18, 2006
अमेरिका में वकील कई कारण से चिट्ठे लिखते हैं। इन चिट्ठों में कई तरह की बातें करते हैं:
- कुछ कानून की बाते लिखते हैं तो कुछ अपने लॉ फर्म के बारे में;
- कुछ यदि संवैधानिक मुद्दे उठाते हैं तो कुछ अपना विज्ञापन करते हैं;
- कुछ व्यक्तिगत हैं तो कुछ केवल मुवक्किल पकड़ने के लिये।
वकील अपना विज्ञापन नहीं कर सकते हैं। यह उनके सदाचार के नियम के विरुद्ध है। इस पर अंकुश लगाने के लिये अमेरिका में कुछ स्टेट अपने कानून में परिवर्तन कर रहे हैं। हो सकता है कि वकीलों के चिट्ठे भी इस कानून के चपेट में आ जायें और अमेरिका के वकील उस तरह से चिट्ठे न लिख पायें जिस तरह से वे इस समय लिख रहें हैं। पर यह तय कर पाना मुश्किल है कि कब विज्ञापन हो रहा है और कब स्वतंत्र विचार व्यक्त किये जा रहे हैं। यह कठिन कार्य होगा। आप भी पढ़ें इस खबर को।
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Posted by उन्मुक्त on October 11, 2006
मां को कैसे बतायें – यह भी कोई चर्चा का विषय है?
है तो …
मैंने कुछ दिन पहले मैंने इसी चिट्ठे पर आईने, आईने यह तो बता – दुनिया में सबसे सुन्दर कौन और उन्मुक्त चिट्ठे पर Trans-gendered – सेक्स परिवर्तित पुरुष या स्त्री नाम की चिट्ठी पोस्ट कर, कुछ ऐसे बातों का उल्लेख किया जो हमारे समाज में तो हैं पर उन्हें ठीक नहीं माना जाता।
शोभा डे The Week में एक कॉलम THE SEXES के नाम से लिखती हैं। इसके १५ अक्टूबर २००६ के अंक में वे विक्रम सेठ के समलैंगिग रिश्तों के बारे वा उनका इन रिश्तों पर समर्थन देने के बारे में यहां बता रही हैं।
इस लेख में वे एक पत्रकार का जिक्र करती हैं जिसने इस तरह के रिश्ते के बारे में अपनी मां को एक रेस्तराँ में इस लिये बताया क्योंकि उसकी मां वहां पर नहीं रोती। लेख के अनुसार पत्रकार की मां ने यह सुन कर रोया तो नहीं पर खाना खाना बन्द कर दिया और एकदम चुप हो कर खिड़की के बाहर देखने लगींं। मैं नहीं समझता कि यह वाक्या सच है क्योंकि अपनी मां या किसी भी प्रिय जन को इस तरह की बात बताने का इससे ज्यादा क्रूर तरीका नहीं हो सकता।
एक बार मेरी मुलाकात ऑस्ट्रेलिया के एक प्रमुख व्यक्ति से हुई – अपने विषय में वे विश्व की जानी मानी हस्ती हैं। वे भी समलैंगिग हैं। उन्होंने मुझसे बताया कि जब तक उनकी मां जिन्दा रहीं उन्होने इस बात को गुप्त रखा, केवल उनके मरने के बाद उसको जग जाहिर किया। मेरे उनसे पूछने पर कि उन्होंने ऐसा क्यों किया उनका जवाब था कि,
‘मै जो हूं, मेरी जो पसन्द है वह ईश्वर के कारण है। इसमें मेरा कोई दोष नहीं। मेरी मां यह नहीं समझ पाती। उन्हे बहुत दुख होता और वे अपने को ही दोषी ठहरातीं। मैं उन्हें दुख नहीं देना चाहता था इसलिये इस बात को गुप्त रखा। आज वे नहीं हैं इसलिये सही बात को छुपाने का कोई कारण नहीं है। ‘
लोगों के अपने अपने तरीके, मां से के सामने दिल खोलने के लिये।
अन्य चिट्ठों पर क्या नया है इसे आप दाहिने तरफ साईड बार में, या नीचे देख सकते हैं।
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Posted by उन्मुक्त on October 10, 2006
यह तो चिट्ठा-नशे की हद हो गयी।
अमेरिकी न्यायलय के न्यायालय की जूरी के फोरमैन मुकदमे के बारे में चिट्ठे लिखने गये। पर क्या इससे अभियुक्त को न्याय नहीं मिल पाया? एक ऐसे मामले में न्यू हैम्शायर के सर्वोच न्यायालय के मुताबिक तो सजा बरकरार रहेगी। इसे यहां पढ़िये। इसके साथ यह भी पढ़िये कि किस तरह से जूरी भी कोर्टरूम के अन्दर से चिट्ठे लिखने में मशगूल हैं।
क्या इससे न्याय प्रणाली प्रभावित हो रही है?
चलिये देखते हैं कि कब कोई ज़ज साहब कोर्टरूम से चिट्ठा प्रकाशित करते हैं।
अन्य चिट्ठों पर क्या नया है इसे आप दाहिने तरफ साईड बार में, या नीचे देख सकते हैं।
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Posted by उन्मुक्त on October 3, 2006
आज कल हिन्दे चिट्ठे जगत पर हिन्दी को ठीक लिखने ओर उसके सही करने तरीके पर बहस चल रही है। इसकी कुछ झलकियां आप यहां, यहां और यहां देख सकते हैं। यह बहस हिन्दी भाषा तक ही सीमित नहीं है, अंग्रेजी में भी बहस चलती रहती है पर अक्सर यह तय करना मुश्किल है कि क्या सही है और क्या गलत।
अब नील आर्मस्ट्रौंग के उस वाक्य को ही ले लें जो उन्होने २० जुलाई १९६९ को चन्द्रमा पर पहला कदम रखते समय दिया था। नासा केे मुताबिक, आर्मस्ट्रौंग नेे कहा था,
‘That’s one small step for man, one giant leap for mankind.’
अंग्रेजी व्याकरण विशेष्ज्ञों के अनुसार man के पहले a होना चाहिये था। आर्मस्ट्रौंग का भी कहना था कि उसने a कहा था। अब ऑस्ट्रेलिया के कंप्यूटर प्रोग्रामर पीटर शैन फोर्ड ने कंप्यूटर से टेस्ट करके बताया है कि a शब्द बोला गया था। यानी कि आर्मस्ट्रौंग ने यह कहा था कि,
‘That’s one small step for a man, one giant leap for mankind’,
पर दोनो में से कौन सा वाक्य व्याकरण की दृष्टि में सही है।
मैं अंग्रेजी भाषा का ज्ञाता तो नहीं हूं पर मेरे विचार से दोनो वाक्य सही हैं। गलत और सही तो इस बात पर निर्भर करता है कि नील आर्मस्ट्रौंग, कहना क्या चाहते थे? यदि वे यह कहना चाहते थे कि,
‘एक मानव के लिये छोटा कदम, पर मानव जाति के लिये लम्बी छलांग’
तो बेशक a प्रयोग करना चाहिये था। यदि वे कहना चाहते थे कि,
‘मानव के लिये छोटा कदम, पर मानव जाति के लिये लम्बी छलांग’
तो a का प्रयोग ठीक नहीं था।
सच में, यदि मैं उनकी जगह होता तो a शब्द का प्रयोग नहीं करता। मेरे विचार से उस अवसर के लिये उपयुक्त वाक्य था ‘मानव के लिये छोटा कदम, पर मानव जाति के लिये लम्बी छलांग’ न कि ‘एक मानव के लिये छोटा कदम, पर मानव जाति के लिये लम्बी छलांग’।
यह सच है कि वह कदम तो एक व्यक्ति (नील आर्मस्ट्रौंग) ने लिया था पर वह हज़ारों लोगों की मेहनत का फल था; वह कदम उन सब की आकांक्षाओं का फल था। मैं उसे एक व्यक्ति के कदम से न जोड़ कर सबसे जोड़ने की बात करता।
देखते हैं कि हिन्दी चिट्टे जगत में यह बहस कितने दिन और चलती है।
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Posted by उन्मुक्त on October 1, 2006
चिट्ठे तो बहुत से हैं पर यह चिट्ठा और इसके YouTube तो सबसे खास हैं, सबसे अलग। हों भी क्यों ना, यह चिट्ठा है अनुशेह अन्सारी का – पहली ईरानियन अमेरिकन स्पेस महिला का। इससे क्या फर्क पड़ता है कि वे व्यक्तिगत रूप से गयीं थीं।
इस चिट्ठे में है, दुनिया की स्पेस से लिखी पहली चिट्ठी और कुछ वह़ां कि बातें – वह भी एक महिला के नजर से।
मुझे तो रोचक लगा
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